रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं। इन प्रतिबंधों का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा। इसी बीच अमेरिका ने भारत की भूमिका की सराहना की है। अमेरिकी प्रशासन ने कहा कि भारत ने रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों पर जिम्मेदार रवैया दिखाया।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने यह बात फॉक्स बिजनेस के कार्यक्रम में कही। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पहले भारत से प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद रोकने का अनुरोध किया था। भारत ने उस अनुरोध का सम्मान किया और अपनी खरीद रणनीति में बदलाव किया।
बेसेंट ने कहा कि भारत ने इस मामले में सहयोगी रवैया अपनाया। इसलिए अमेरिका भारत को एक जिम्मेदार भागीदार के रूप में देखता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नई दिल्ली ने पहले अमेरिकी आग्रह का पालन किया और बाद में अस्थायी छूट मिली।
दरअसल, उस समय वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर ईरान चिंता बढ़ रही थी। कई जहाजों में रूसी तेल पहले से लदा हुआ था और समुद्र में फंसा हुआ था। अगर उन कार्गो को पूरी तरह रोक दिया जाता, तो बाजार में अचानक आपूर्ति कम हो सकती थी।
इसी कारण अमेरिका ने एक व्यावहारिक फैसला लिया। वाशिंगटन ने भारत को उन रूसी तेल खेपों को स्वीकार करने की अनुमति दी जो पहले से जहाजों में लदी थीं। इस कदम का उद्देश्य वैश्विक बाजार में अचानक आपूर्ति संकट से बचना था।
बेसेंट ने बताया कि भारत ने पहले ही वैकल्पिक योजना तैयार कर ली थी। भारतीय कंपनियां रूसी तेल की जगह अमेरिकी तेल खरीदने की तैयारी कर रही थीं। हालांकि, संभावित आपूर्ति अंतर को देखते हुए अमेरिका ने अस्थायी रूप से रूसी तेल स्वीकार करने की अनुमति दी।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका आगे भी कदम उठा सकता है। उनके अनुसार, अगर वैश्विक बाजार में तेल की कमी बढ़ती है तो वाशिंगटन कुछ अतिरिक्त रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध हटा सकता है। इस तरह बाजार में अधिक आपूर्ति लाई जा सकती है।
उधर पश्चिम एशिया में तनाव ने तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। से जुड़े संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ऊपर धकेला है। विशेषज्ञों को आशंका है कि अगर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो आपूर्ति बाधित हो सकती है।
इस पृष्ठभूमि में ऊर्जा बाजार लगातार दबाव महसूस कर रहा है। कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश तेज कर दी है। इसी कारण अमेरिकी तेल की मांग भी बढ़ती दिख रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी खाड़ी तट से मिलने वाले भारी कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। खासकर मार्स सौर क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ीं। यह तेल मैक्सिको की खाड़ी से निकलता है और अमेरिकी ऊर्जा बाजार में अहम भूमिका निभाता है।
यह क्रूड बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट के मुकाबले लगभग 11 डॉलर प्रीमियम पर कारोबार करता दिखा। यह स्तर अप्रैल 2020 के बाद सबसे ऊंचा माना जा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में आपूर्ति अनिश्चितता ने इस रुझान को तेज किया। साथ ही कुछ खाड़ी उत्पादकों ने उत्पादन सीमित रखा। इसके अलावा टैंकर आवाजाही को लेकर भी चिंता बढ़ी है, खासकर होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास।
इन परिस्थितियों में कई रिफाइनरियों ने अमेरिकी भारी तेल की ओर रुख किया। इससे अमेरिकी क्रूड की मांग बढ़ी और कीमतों में तेजी आई।
कुल मिलाकर, वैश्विक तेल बाजार इस समय भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका भारत के सहयोग की सराहना करता है, जबकि साथ ही वह बाजार स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने विकल्प खुले रखता है।