जनरेशन-Z आंदोलन के बाद नेपाल में नई शुरुआत: सुशीला कार्की चुनावी राह दिखा रहीं
khabarworld 05/03/2026 0
सितंबर 2025 में नेपाल ने तेज राजनीतिक उथल-पुथल देखी। कुछ ही दिनों में काठमांडू की सड़कों पर हजारों लोग उतर आए। संसद भवन में आग लगी। प्रधानमंत्री आवास पर हमला हुआ। कई मंत्रियों को हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। इन घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान नेपाल की ओर खींचा।
दरअसल, इस संकट की चिंगारी सोशल मीडिया प्रतिबंध से भड़की। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने 4 सितंबर 2025 को कई डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोक लगाई। सरकार ने नया डिजिटल कानून लागू किया और कंपनियों से पंजीकरण की मांग की। हालांकि, इस फैसले ने युवाओं में भारी नाराज़गी पैदा की।
दरअसल, असंतोष पहले से जमा था। नेपाल में 2008 में राजशाही खत्म हुई। उसके बाद से देश ने लगातार राजनीतिक अस्थिरता देखी। सत्रह वर्षों में चौदह सरकारें बनीं। भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ीं। युवाओं में बेरोज़गारी लगभग 20 प्रतिशत के आसपास रही। हर दिन हजारों युवा रोज़गार के लिए विदेश जाते रहे। इसलिए सोशल मीडिया प्रतिबंध ने पुराने गुस्से को भड़का दिया।
8 सितंबर की सुबह हजारों युवा काठमांडू के माइतीघर मंडला में जुटे। उनमें कई छात्र भी थे। वे संसद की ओर मार्च करने लगे। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ नारे लगाए। उन्होंने राजनीतिक परिवारों के विशेषाधिकार पर भी सवाल उठाए।
स्थिति जल्दी बिगड़ी। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। गोलीबारी हुई। कई लोग घायल हुए और कई की मौत हुई। इसके बाद गुस्सा और बढ़ा। अगले दिन काठमांडू के कई सरकारी भवनों को निशाना बनाया गया। संसद परिसर, पुलिस स्टेशन और कई सरकारी इमारतों में आग लगी।
इस बीच संकट और गहरा गया। नेपाल सेना ने देशभर में कर्फ्यू लागू किया। हिंसा में दर्जनों लोगों की जान गई और हजारों घायल हुए। आर्थिक नुकसान भी भारी रहा। राजनीतिक दबाव बढ़ने पर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया।
हालांकि आंदोलन यहीं नहीं रुका। युवा संगठनों ने आगे की रणनीति तैयार की। “हामी नेपाल” नाम के समूह ने ऑनलाइन बैठकें आयोजित कीं। हजारों लोग मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Discord पर जुड़े। उन्होंने देश के भविष्य और नए नेतृत्व पर चर्चा की।
इसी प्रक्रिया में एक नाम तेजी से उभरा— सुशीला कार्की । वह नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश रह चुकी थीं। कई युवाओं ने उन्हें ईमानदार और स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में देखा।
सुशीला कार्की का लंबा सार्वजनिक जीवन रहा है। उनका जन्म 1952 में बिराटनगर में हुआ। उन्होंने भारत के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पढ़ाई की। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई की और न्यायिक सेवा में आगे बढ़ीं। 2016 में वह नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं।
उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई विवादित सरकारी फैसलों को चुनौती दी। एक बार उन्होंने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति पर सरकार के फैसले को पलट दिया। इसके बाद संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की कोशिश हुई। लेकिन जन दबाव के कारण यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। इस घटना ने उनकी साख और मजबूत की।
आखिरकार 12 सितंबर 2025 को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। वह नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। शपथ समारोह राष्ट्रपति भवन शीतल निवास में हुआ। इसमें युवा प्रतिनिधि, विदेशी राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी भी शामिल हुए।
कार्की ने पद संभालते ही स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का मुख्य लक्ष्य निष्पक्ष चुनाव कराना है। सरकार ने अगले आम चुनाव की तारीख मार्च 2026 तय की।
भारत ने भी इस बदलाव का स्वागत किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें बधाई दी और इसे महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बताया। कार्की ने भी भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करने की बात कही।
प्रधानमंत्री बनने के बाद कार्की ने कई कदम उठाए। उन्होंने आंदोलन में मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा दिया। घायलों से अस्पताल में मुलाकात की। सरकार ने हिंसा की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाया और पुनर्निर्माण कोष भी शुरू किया।
फिर भी नेपाल की राजनीति अभी संक्रमण के दौर में है। पुराने नेता अभी भी सक्रिय हैं। वहीं काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह जैसे नए चेहरे भी उभर रहे हैं।
इस बीच कार्की लगातार स्थिरता पर जोर देती हैं। उनका मानना है कि अराजकता से समाधान नहीं मिलता। केवल शांति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही देश को आगे ले जा सकती है। इसलिए अब सबकी नजर आने वाले चुनावों पर टिकी है, जो नेपाल की नई राजनीतिक दिशा तय करेंगे।
