खामेनेई की हत्या पर केंद्र की चुप्पी पर सोनिया गांधी का सवाल, कश्मीर का भी दिलाया स्मरण

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नई दिल्ली में कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार के रुख पर तीखा सवाल उठाया। उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर सरकार की चुप्पी को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यह चुप्पी तटस्थता नहीं दिखाती, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना दर्शाती है।

उन्होंने एक लेख में लिखा कि भारत और ईरान के संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और रणनीतिक भी हैं। इसलिए भारत को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि कई मौकों पर तेहरान ने नई दिल्ली की मदद की।

इस बीच केंद्र सरकार ने खामेनेई की मौत पर सीधा बयान नहीं दिया। हालांकि सरकार ने पश्चिम एशिया में संयम और तनाव कम करने की अपील की। सरकारी सूत्रों ने कहा कि भारत ने संतुलित रुख अपनाया। उन्होंने दावा किया कि यह रुख बड़े वैश्विक देशों की प्रतिक्रिया के अनुरूप है और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है।

लेकिन सोनिया गांधी ने इस तर्क को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि अमेरिका और इज़राइल ने लक्षित हमले में खामेनेई की हत्या की। उन्होंने इसे चल रही बातचीत के दौरान किसी राष्ट्र प्रमुख की हत्या बताया। उनके अनुसार यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार पैदा करता है।

उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi के बयान पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने पहले ईरान की यूएई पर जवाबी कार्रवाई की निंदा की, लेकिन उससे पहले की घटनाओं पर कुछ नहीं कहा। बाद में उन्होंने संवाद और कूटनीति की बात की। गांधी ने तर्क दिया कि हमलों से पहले ही संवाद की प्रक्रिया चल रही थी।

इसके अलावा उन्होंने विदेश नीति की विश्वसनीयता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यदि भारत संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून की खुलकर रक्षा नहीं करता, तो उसकी साख प्रभावित होगी। उन्होंने यह भी कहा कि बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के और कूटनीतिक प्रक्रिया के दौरान हत्या हुई। ऐसे मामलों पर सिद्धांत आधारित आपत्ति जरूरी है।

उन्होंने समय को भी महत्वपूर्ण बताया। खामेनेई की हत्या से 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री मोदी इज़राइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की सरकार के प्रति समर्थन दोहराया। गांधी ने कहा कि गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में नागरिक हताहत हुए हैं, जिससे वैश्विक चिंता बढ़ी है।

साथ ही उन्होंने कश्मीर का मुद्दा उठाया। उन्होंने याद दिलाया कि 1994 में Organisation of Islamic Cooperation के कुछ सदस्य कश्मीर पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाना चाहते थे। उस समय ईरान ने उस कोशिश को रोकने में अहम भूमिका निभाई। गांधी ने कहा कि उस हस्तक्षेप ने कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण को रोका।

उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने ज़ाहेदान में भारत की कूटनीतिक मौजूदगी को संभव बनाया। यह स्थान पाकिस्तान सीमा के पास है और ग्वादर पोर्ट तथा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन में रणनीतिक महत्व रखता है।

गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की 2001 की तेहरान यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वाजपेयी ने तब भारत-ईरान संबंधों को मजबूती से स्वीकार किया था। उन्होंने संकेत दिया कि वर्तमान सरकार उस विरासत को महत्व नहीं दे रही।

उन्होंने माना कि हाल के वर्षों में भारत और इज़राइल के संबंध रक्षा, कृषि और तकनीक में मजबूत हुए हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि भारत दोनों देशों से संबंध रखता है, इसलिए उसे संतुलित और विश्वसनीय रुख अपनाना चाहिए।

अंत में उन्होंने खाड़ी देशों में बसे लगभग एक करोड़ भारतीयों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने पहले भी संकटों में अपने नागरिकों की रक्षा की है क्योंकि उसने स्वतंत्र रुख रखा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भारत सिद्धांतों पर स्पष्ट नहीं रहेगा, तो वैश्विक दक्षिण के देश उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं।


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