संजू सैमसन ने इंतजार किया। उन्होंने संघर्ष किया। अब उन्होंने जवाब दिया।
2024 टी20 विश्व कप में वह टीम के साथ गए, लेकिन एक भी मैच नहीं खेले। भारत ने खिताब जीता। सैमसन डगआउट से तालियां बजाते रहे। 1983 में सुनील वल्सन भी पूरी विश्व कप टीम का हिस्सा रहे, पर मैदान पर नहीं उतरे। सैमसन के लिए भी वह अनुभव आसान नहीं रहा। यशस्वी जायसवाल और युजवेंद्र चहल भी उस अभियान में नहीं खेले, फिर भी खालीपन सैमसन के साथ रहा।
करीब 20 महीने बाद फिर वही आशंका सामने खड़ी हुई। सूर्यकुमार यादव की अगुआई में भारत नए अभियान पर निकला। इशान किशन ने विकेटकीपर की दौड़ में मजबूत दावा ठोका। अभिषेक शर्मा ओपनर बने। तिलक वर्मा और सूर्यकुमार ने मध्यक्रम संभाला। तीन ऑलराउंडरों समेत कई पावर-हिटर पांच से आठ तक जमे रहे। सैमसन फिर हाशिए पर दिखे।
टूर्नामेंट शुरू हुआ तो किस्मत ने करवट ली। अभिषेक शर्मा को पेट का संक्रमण हुआ। वह नामीबिया के खिलाफ नहीं खेले। सैमसन ने मौका पकड़ा। उन्होंने आठ गेंद में 22 रन ठोके। हालांकि, अगला मैच आते ही अभिषेक लौटे और सैमसन फिर बाहर बैठ गए। उन्हें लगा कहानी यहीं खत्म हो गई।
लेकिन घटनाक्रम बदला। भारत लगातार तीन मैचों में पहले ओवर में बाएं हाथ के ओपनर को ऑफ स्पिनर के खिलाफ गंवाने लगा। टीम प्रबंधन ने संतुलन खोजा। सैमसन दाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। उन्होंने विकल्प दिया। वह फिर प्लेइंग इलेवन में आए।
शुरुआत में उन्होंने 15 गेंद में 24 रन बनाए। फिर एक बार गलती की और आउट हुए। आलोचना उठी। चेपॉक में आहें गूंजी। देशभर में उनके समर्थक निराश दिखे।
फिर आया निर्णायक मुकाबला। वेस्टइंडीज के खिलाफ वर्चुअल क्वार्टरफाइनल। शाई होप की टीम ने 195 रन बनाए। मैच नॉकआउट जैसा था। भारत ने विश्व कप में कभी इतना बड़ा लक्ष्य सफलतापूर्वक नहीं पीछा किया था। दबाव साफ दिखता था।
सैमसन पर नहीं।
उन्होंने तीसरे ओवर में अकील होसैन पर 4, 6, 6 जड़े। उन्होंने लय पकड़ी। उन्होंने आक्रामक इरादा दिखाया। अभिषेक और इशान जल्दी आउट हुए। पांच ओवर में 41 रन पर दो विकेट गिरे। सैमसन डटे रहे।
सूर्यकुमार यादव आउट हुए तो 97 रन बाकी थे। हार्दिक पांड्या लौटे तो 10 गेंद में 17 रन चाहिए थे। सैमसन ने घबराहट नहीं दिखाई। उन्होंने स्ट्राइक रोटेट की। उन्होंने गैप खोजे। उन्होंने बाउंड्री निकाली।
उन्होंने 328 टी20 मैचों के अनुभव को पहली बार इस अंदाज में ढाला। उन्होंने ओपनिंग करते हुए लक्ष्य पूरा किया। वह 97 रन पर नाबाद लौटे। यह शतक नहीं था, लेकिन करियर की सबसे अहम पारी थी।
सैमसन ने बाद में स्वीकार किया कि उन्होंने विराट कोहली और रोहित शर्मा को लक्ष्य का पीछा करते देखा और सीखा। उन्होंने वही सबक इस रात लागू किया। उन्होंने मैच को हिस्सों में बांटा। उन्होंने अंत तक जिम्मेदारी ली।
यह बदलाव अचानक नहीं आया। सैमसन ने तकनीक पर मेहनत की। उनका ट्रिगर मूवमेंट संतुलन बिगाड़ता था। वजन दाएं पैर पर अटकता था। शॉर्ट गेंद के खिलाफ उन्हें दिक्कत होती थी। उन्होंने नेट्स में घंटों अभ्यास किया। उन्होंने आधार सुधारा। उन्होंने शॉट चयन निखारा।
रविवार को उसका नतीजा दिखा। उन्होंने ड्राइव जमाए। पुल शॉट नियंत्रित रखे। सीधे शॉट से दबाव हटाया। आखिरी गेंद को मिड-ऑन के ऊपर से चौके के लिए भेजा और मैच खत्म किया।
गेंद सीमा रेखा पार करते ही सैमसन घुटनों पर बैठ गए। उन्होंने हाथ उठाए। भीड़ गरजी। सालों की निराशा उसी पल खत्म हुई।
भारत सेमीफाइनल में पहुंचा। सैमसन केंद्र में आ गए। अब सवाल यह नहीं कि वह अस्थिर हैं या नहीं। अब चर्चा यह है कि वह अगली बार क्या कमाल दिखाएंगे।