‘मिया’ टिप्पणी पर हिमंता बिस्वा सरमा को नोटिस, गुवाहाटी हाईकोर्ट में सुनवाई

0
biwas

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने गुरुवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को नोटिस जारी किया। अदालत ने यह कदम कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद उठाया। याचिकाकर्ताओं ने सरमा पर ‘मिया’ शब्द को लेकर बार-बार आपत्तिजनक बयान देने का आरोप लगाया। सरमा इस शब्द का इस्तेमाल बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में करते रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश अशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने तीन जनहित याचिकाओं पर दलीलें सुनीं। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, चंदर उदय सिंह और मीनाक्षी अरोड़ा ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखा। इसके बाद अदालत ने मुख्यमंत्री, असम सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस भेजने का निर्देश दिया। हालांकि अदालत ने इस चरण पर भाजपा को नोटिस भेजने की जरूरत नहीं समझी। अदालत ने अगली सुनवाई अप्रैल में तय की।

इससे पहले याचिकाकर्ता इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। याचिकाकर्ताओं में प्रख्यात विद्वान हिरेंद्रनाथ गोहैन, पूर्व डीजीपी हरेकृष्ण डेका, पत्रकार परेश मलाकर और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई से इनकार किया और उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने को कहा। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने 2023 से अब तक मुख्यमंत्री के कई सार्वजनिक बयानों का उल्लेख किया। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुख्यमंत्री एक दोहराए जाने वाले पैटर्न में बयान देते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये बयान संविधान के अनुच्छेद 14 और 15, प्रस्तावना और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और भविष्य में ऐसे बयानों पर रोक लगाने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं ने कुछ उदाहरण भी गिनाए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने लोगों से ‘मियाओं को परेशान’ करने की बात कही। उन्होंने खुद इसे अपना ‘काम’ बताया। एक बयान में उन्होंने रिक्शा चालक को पांच रुपये मांगने पर चार रुपये देने की बात कही। इसके अलावा उन्होंने महात्मा गांधी के ‘असहयोग’ और ‘सविनय अवज्ञा’ के सिद्धांतों का जिक्र करते हुए ऐसा माहौल बनाने की बात कही जिसमें वे असम में न रह सकें।

साल 2024 में मुख्यमंत्री ने एक निजी विश्वविद्यालय पर ‘फ्लड जिहाद’ का आरोप लगाया और उसे गुवाहाटी में बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया। अगस्त 2024 में विधानसभा में उन्होंने कहा कि वह ‘पक्ष लेंगे’ और ‘मिया मुसलमानों को पूरे असम पर कब्जा नहीं करने देंगे’। याचिकाकर्ताओं ने एक एआई जनित वीडियो का भी जिक्र किया, जिसमें भाजपा असम के सोशल मीडिया अकाउंट पर मुख्यमंत्री को टोपी पहने दो लोगों पर निशाना साधते दिखाया गया था। बाद में वह वीडियो हटा दिया गया।

चंदर उदय सिंह ने अदालत में कहा कि मुख्यमंत्री पूरे राज्य के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि पद पर बैठा व्यक्ति हर समुदाय के हित की रक्षा करता है। इसलिए ऐसे बयान समाज में पीड़ा और असुरक्षा पैदा करते हैं। मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि सत्ता में बैठा व्यक्ति ऐसा वक्तव्य नहीं दे सकता जो कानून व्यवस्था पर असर डाले या लोगों को कानून हाथ में लेने के लिए उकसाए।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा कि पेश बयानों में विभाजन की प्रवृत्ति झलकती है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही आगे का फैसला करेगी। अब सभी की नजरें अप्रैल में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest News