बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ मुकुल रॉय का निधन, 71 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

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मुकुल रॉय अब इस दुनिया में नहीं रहे। रविवार तड़के कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल्स में उन्होंने आखिरी सांस ली। समय करीब 1:30 बजे था। उनके बेटे सुभ्रांशु रॉय  ने निधन की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि दिल का तेज दौरा पड़ा और डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

पिछले कुछ वर्षों से मुकुल रॉय गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। डॉक्टरों ने उनमें डिमेंशिया की पहचान की थी। धीरे-धीरे उनकी याददाश्त कमजोर हुई। वह करीबी लोगों को पहचान नहीं पाते थे। डॉक्टर उन्हें राइल्स ट्यूब के जरिए तरल आहार देते थे। कुछ दिन पहले वह कोमा में चले गए। इसके बाद परिवार और समर्थकों की चिंता बढ़ गई।

राजनीतिक जीवन की बात करें तो मुकुल रॉय ने लंबा सफर तय किया। उन्होंने 1998 में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC या TMC) की स्थापना में ममता बनर्जी  का साथ दिया। इसके बाद उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया। कार्यकर्ता उन्हें रणनीतिकार मानते थे। इसी कारण लोग उन्हें बंगाल की राजनीति का ‘चाणक्य’ कहते थे।

2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे को सत्ता से हटाया। इस जीत में मुकुल रॉय ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने जिलों में संगठन खड़ा किया। उन्होंने चुनावी रणनीति तैयार की। जीत के बाद केंद्र की यूपीए-2 सरकार में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए रेल मंत्री का दायित्व भी संभाला।

हालांकि समय के साथ उनके और ममता बनर्जी के रिश्तों में दूरी आई। सारधा चिटफंड मामले में उनका नाम सामने आया। फिर नारदा स्टिंग प्रकरण ने भी विवाद खड़ा किया। इन घटनाओं के बाद पार्टी ने उन्हें महासचिव पद से हटा दिया।

इसके बाद 2017 में उन्होंने बड़ा राजनीतिक फैसला लिया। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर BJP का दामन थामा। इस कदम ने सबको चौंकाया। उन्होंने भाजपा के लिए बंगाल में संगठन खड़ा किया। परिणामस्वरूप 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 42 में से 18 सीटें जीतीं। इस सफलता में उनकी रणनीति की भूमिका मानी गई।

2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कृष्णानगर से भाजपा उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। लेकिन समय के साथ पार्टी में उनका प्रभाव घटा। जब सुवेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता बने, तब समीकरण बदले। इसके तुरंत बाद मुकुल रॉय ने भाजपा छोड़ दी और फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौट आए।

जून 2021 में ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी में वापस लिया। उन्होंने कहा कि मुकुल परिवार के पुराने सदस्य हैं। हालांकि उनकी दूसरी पारी ज्यादा सक्रिय नहीं रही। बीमारी ने उन्हें सार्वजनिक जीवन से दूर कर दिया।

2023 में उनकी बीमारी खुलकर सामने आई, जब दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने खुद को भाजपा विधायक बताया। इससे राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई। बाद में 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य ठहराया। अदालत ने कहा कि पार्टी बदलने से दलबदल कानून लागू होता है।

इस तरह मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा। उन्होंने रणनीति बनाई, दल बदले और सत्ता की राजनीति को करीब से देखा। अंत में बीमारी ने उनके कदम रोक दिए। बंगाल की राजनीति अब अपने एक बड़े रणनीतिकार को याद करेगी।


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