भारत ने रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों के निर्माण में 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री शामिल करने की मांग की है। उन्होंने यह बात उच्चस्तरीय रक्षा वार्ता के दौरान रखी।
सबसे पहले, सिंह ने सह-डिजाइन, सह-विकास और सह-उत्पादन को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल खरीदार नहीं बनना चाहता। बल्कि वह तकनीक और उत्पादन में बराबर की भागीदारी चाहता है।
इसके बाद, उन्होंने फ्रांसीसी पक्ष से भारतीय कंपनियों की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने साफ कहा कि राफेल उत्पादन प्रणाली में भारतीय उद्योग की मजबूत मौजूदगी जरूरी है।
इस दौरान, फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन द्वारा बनाए जा रहे राफेल विमानों पर भी चर्चा हुई। भारतीय अधिकारियों ने कंपनी से स्थानीय निर्माण बढ़ाने की मांग रखी।
साथ ही, यह प्रस्ताव भारतीय वायुसेना के लिए प्रस्तावित 114 मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़ा है। इन विमानों को भारतीय वायु सेना के बेड़े में शामिल किया जाना है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, राफेल इस दौड़ में सबसे आगे है।
इसके अलावा, यह पहल “मेक इन इंडिया” अभियान से भी जुड़ी है। सरकार रक्षा उत्पादन को घरेलू उद्योग से जोड़ना चाहती है। अधिकारियों का मानना है कि इससे रोजगार बढ़ेगा और तकनीकी क्षमता मजबूत होगी।
यह नई रणनीति मुंबई में हुई छठी भारत-फ्रांस वार्षिक रक्षा वार्ता में सामने आई। इस बैठक की सह-अध्यक्षता राजनाथ सिंह और फ्रांस की मंत्री कैथरीन वाउटरिन ने की।
इस बैठक में दोनों देशों ने दस साल के रक्षा सहयोग ढांचे को आगे बढ़ाया। वरिष्ठ अधिकारियों ने रक्षा संबंधों को द्विपक्षीय साझेदारी की मजबूत नींव बताया।
इसके बाद, राजनीतिक स्तर पर भी रिश्तों को नई ऊंचाई मिली। 17 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संबंधों को “विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया।
इस समझौते के तहत दोनों देश वायु, थल और नौसेना प्रणालियों में दीर्घकालिक सहयोग करेंगे। साथ ही, अहम और दोहरे उपयोग वाली तकनीकों पर भी मिलकर काम करेंगे।
इसी क्रम में, रक्षा विमानन क्षेत्र को नई प्राथमिकता मिली। दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन विमानों के अनुबंध में प्रगति का स्वागत किया।
इसके अलावा, लड़ाकू विमानों के इंजन विकास पर भी चर्चा हुई। फ्रांसीसी कंपनी सैफरन भारतीय साझेदारों के साथ मिलकर काम करने की योजना बना रही है।
इस बीच, रक्षा अधिग्रहण परिषद की मंजूरी ने बातचीत को तेज कर दिया है। परिषद ने 114 नए लड़ाकू विमानों की खरीद को हरी झंडी दी है। इससे मंत्रालय पर जल्द फैसला लेने का दबाव बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत की सबसे बड़ी रक्षा खरीद में शामिल हो सकती है। साथ ही, यह सौदा पारंपरिक खरीदार-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़कर दीर्घकालिक औद्योगिक साझेदारी की दिशा में जाएगा।
अंत में, सरकार ने साफ कर दिया है कि वह स्थानीय उत्पादन पर समझौता नहीं करेगी। वह मजबूत आपूर्ति श्रृंखला बनाना चाहती है। वह कुशल मानव संसाधन तैयार करना चाहती है।
इस रणनीति के जरिए भारत सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों को मजबूत करना चाहता है। 50 प्रतिशत स्वदेशी लक्ष्य के साथ, नई दिल्ली ने भविष्य की रक्षा नीति की स्पष्ट दिशा तय कर दी है।