सोमवार को भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को कड़ा संदेश दिया। अदालत ने कहा कि तीन मिनट के भाषण का सात–आठ मिनट का ट्रांसक्रिप्ट गंभीर संदेह पैदा करता है। पहले अदालत ने दस्तावेज देखे। फिर उसने सवाल उठाए। अंत में उसने साफ शब्दों में नाराज़गी जताई।
यह सुनवाई सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से जुड़ी है। सितंबर में प्रशासन ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया था। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।
सबसे पहले, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना भालचंद्र वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई की। इसके बाद वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने केंद्र द्वारा पेश ट्रांसक्रिप्ट दिखाए।
सिब्बल ने साफ कहा कि सरकार ने ऐसे शब्द जोड़े, जो वांगचुक ने कभी नहीं बोले। उन्होंने बताया कि “आत्मदाह” और “सरकार गिराने” जैसे शब्द भाषण में थे ही नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि वे पहले ही यह बात अदालत को बता चुके हैं, लेकिन सरकार ने जवाब नहीं दिया।
इसके बाद पीठ ने केंद्र से स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से कहा कि असली और सही ट्रांसक्रिप्ट पेश करें। न्यायाधीशों ने कहा कि हिरासत का आदेश इन्हीं दस्तावेजों पर टिका है।
फिर अदालत ने केंद्र की सूची पर सवाल उठाया। उसने कहा कि कई बातें हिरासत आदेश में दर्ज ही नहीं हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि भाषण और ट्रांसक्रिप्ट में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। यदि तीन मिनट का भाषण आठ मिनट में बदल जाए, तो इसमें दुर्भावना दिखती है।
जब सरकारी वकील ने कहा कि विभाग ने ट्रांसक्रिप्ट तैयार किए और वे विशेषज्ञ नहीं हैं, तब अदालत ने कड़ा जवाब दिया। उसने कहा, “हम AI के दौर में हैं।” उसने जोड़ा कि सटीकता कम से कम 98 प्रतिशत होनी चाहिए।
इसके बाद सिब्बल ने फिर हमला बोला। उन्होंने पूछा कि सरकार ऐसे बयानों पर कैसे भरोसा कर सकती है, जो मौजूद ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि काल्पनिक बातों पर “व्यक्तिगत संतुष्टि” कैसे बन सकती है।
फिर उन्होंने वांगचुक के आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वांगचुक ने राज्यhood और संवैधानिक सुरक्षा की मांग की। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके अपनाए। उन्होंने अनशन और मार्च किए। उन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया।
सिब्बल ने यह भी कहा कि 2022 के बाद वांगचुक के किसी भाषण ने अशांति नहीं फैलाई। उन्होंने कहा कि यह मामला न तो हिंसा भड़काने का है और न ही सार्वजनिक अव्यवस्था का।
सुनवाई के दौरान अदालत ने हल्के अंदाज में एक शेर भी सुनाया। उसने कहा, “हमने वह भी सुना जो उन्होंने कहा ही नहीं।” सिब्बल ने जवाब दिया कि सरकार ने उनकी बात भी नहीं सुनी।
इसके बाद अदालत ने नया आदेश दिया। उसने कहा कि जेल प्रशासन वांगचुक के भाषणों की रिकॉर्डिंग पेनड्राइव में सील कर कोर्ट में पेश करे। यह पेनड्राइव जोधपुर जेल से लाई जाएगी।
पृष्ठभूमि भी अहम है।
2023 से वांगचुक लद्दाख में जलवायु परिवर्तन के असर को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। वे छठी अनुसूची की मांग भी करते रहे हैं। सितंबर में उन्होंने 35 दिन का अनशन शुरू किया। 15 दिन बाद हिंसा भड़की और चार लोगों की मौत हुई। इसके बाद उन्होंने अनशन तोड़ा और युवाओं से हिंसा से दूर रहने की अपील की।
कुल मिलाकर, अदालत की टिप्पणी बेहद सख्त रही। उसने साफ किया कि गलत दस्तावेज न्याय प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाते हैं। उसने पारदर्शिता और जिम्मेदारी पर जोर दिया।
अब मामला रिकॉर्डिंग और सही ट्रांसक्रिप्ट पर टिका है। अगली सुनवाई तय करेगी कि हिरासत का आधार कितना मजबूत है।