घरेलू दबाव में घिरे यूनुस ने विदाई भाषण में चीन और भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ का किया ज़िक्र

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बांग्लादेश के कार्यवाहक मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने अपने विदाई भाषण में सख्त तेवर दिखाए। पहले उन्होंने अपनी सरकार का बचाव किया। फिर उन्होंने विदेश नीति पर जोर दिया। अंत में उन्होंने इसे संप्रभुता और ताकत का प्रतीक बताया।

यूनुस ने एक कठिन दौर में अंतरिम सरकार की कमान संभाली। उन्होंने वर्षों की राजनीतिक केंद्रीकरण नीति, कमजोर संस्थानों और जनता के गुस्से के बाद जिम्मेदारी ली। जुलाई 2024 के आंदोलन ने देश की राजनीति को बदल दिया। लोगों ने सुधार, स्थिरता और सुरक्षा की उम्मीद की। लेकिन कई नागरिकों ने कहा कि सरकार इन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।

विदाई भाषण की शुरुआत में यूनुस ने राष्ट्रवादी भाषा अपनाई। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश ने अपनी गरिमा और स्वतंत्रता वापस हासिल की। उन्होंने यह भी कहा कि देश अब किसी के निर्देश पर नहीं चलता। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत भारत की ओर था।

इसके बाद उन्होंने क्षेत्रीय आर्थिक योजना पर बात की। उन्होंने नेपाल, भूटान और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों यानी ‘सेवन सिस्टर्स’ का जिक्र किया। उन्होंने इन क्षेत्रों को एक साझा आर्थिक क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के बंदरगाह इस क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार बन सकते हैं।

फिर उन्होंने आगे बढ़कर कहा कि खुले समुद्र वैश्विक अर्थव्यवस्था का रास्ता हैं। उन्होंने आर्थिक क्षेत्र, व्यापार समझौते और शुल्क मुक्त बाजार की बात की। इससे उन्होंने ढाका को क्षेत्रीय केंद्र के रूप में पेश किया।

हालांकि, इस बयान से विवाद बढ़ा। उन्होंने भारत के राज्यों को स्वतंत्र देशों के साथ एक ही मंच पर रखा। इससे राजनीतिक सीमाएं धुंधली हुईं। विश्लेषकों ने इसे नई दिल्ली को संदेश देने की कोशिश माना।

भारत लंबे समय से बांग्लादेश के जरिए अपने पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने में निवेश करता रहा है। सड़क, रेल और जलमार्ग पर काम चलता रहा है। लेकिन यूनुस ने इस सोच को पलटने की कोशिश की। उन्होंने संकेत दिया कि अब क्षेत्र की तरक्की बांग्लादेश के फैसलों पर निर्भर करेगी।

इसके बाद यूनुस ने वैश्विक साझेदारी पर जोर दिया। उन्होंने चीन, जापान, अमेरिका और यूरोप के साथ रिश्तों की बात की। उन्होंने “रणनीतिक संतुलन” शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने चीन समर्थित परियोजनाओं की प्रगति भी गिनाई।

उन्होंने तीस्ता नदी परियोजना और नीलफामारी अस्पताल का जिक्र किया। यह इलाका भारत के लिए रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। भारत पहले से ही इन परियोजनाओं को लेकर सतर्क रहा है। लेकिन यूनुस ने कोई आश्वासन नहीं दिया।

फिर उन्होंने रक्षा नीति पर बात की। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अपनी सेना को मजबूत कर रहा है। उन्होंने “किसी भी आक्रमण का जवाब देने” की बात कही। यह बयान सख्त संदेश के रूप में देखा गया।

हालांकि, भाषण में कई अहम बातें गायब रहीं। यूनुस ने घरेलू असफलताओं पर चर्चा नहीं की। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा का जिक्र नहीं किया। उन्होंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया।

उनके कार्यकाल में कई जिलों में हिंदू समुदाय पर हमले हुए। मंदिरों में तोड़फोड़ हुई। धमकियां दी गईं। अधिकार संगठनों ने सरकार पर धीमी कार्रवाई का आरोप लगाया। उन्होंने कट्टरपंथी समूहों पर नरमी बरतने की भी बात कही। लेकिन यूनुस ने इन मुद्दों को नजरअंदाज किया।

इसके बजाय उन्होंने अपने 18 महीने के कार्यकाल को सुधार का दौर बताया। उन्होंने विदेश नीति को उपलब्धि के रूप में पेश किया। उन्होंने आत्मविश्वास और संतुलन की बात दोहराई।

आलोचकों का कहना है कि सरकार अपने मुख्य लक्ष्य में विफल रही। वह लोकतांत्रिक भरोसा नहीं लौटा सकी। वह सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकी।

जब यूनुस सत्ता से विदा ले रहे हैं, तब उनका भाषण एकजुटता से ज्यादा बचाव जैसा लगता है। यह आत्ममंथन से ज्यादा जवाबी हमला दिखता है। उन्होंने अंदरूनी समस्याओं से नजर हटाकर बाहरी मुद्दों पर जोर दिया।

अब बांग्लादेश के सामने बड़ी चुनौती है। उसे देश में भरोसा बहाल करना होगा। उसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, उसे पड़ोसी देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाने होंगे। यह सब बिना टकराव और उकसावे के करना होगा।


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