संघ बोले तो तुरंत पद छोड़ दूंगा: मोहन भागवत का बड़ा बयान

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मुंबई में रविवार को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अहम संदेश दिया। उन्होंने साफ कहा कि संगठन जब कहेगा, वह तुरंत पद छोड़ देंगे। हालांकि, फिलहाल संघ ने उन्हें काम जारी रखने को कहा है। इसलिए, वह पूरी ऊर्जा के साथ जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

सबसे पहले, यह बयान संघ के शताब्दी समारोह में आया। इस कार्यक्रम में देशभर से स्वयंसेवक पहुंचे। मंच से बोलते हुए भागवत ने संगठन की परंपरा को याद दिलाया। उन्होंने कहा कि आरएसएस में चुनाव नहीं होते। वरिष्ठ पदाधिकारी ही सरसंघचालक का चयन करते हैं।

इसके बाद, उन्होंने उम्र से जुड़ी परंपरा पर बात की। उन्होंने बताया कि 75 साल की उम्र के बाद आमतौर पर लोग पद छोड़ते हैं। लेकिन उन्होंने संघ को अपनी उम्र की जानकारी दे दी थी। इसके बावजूद, संगठन ने उनसे काम जारी रखने को कहा। इसलिए, उन्होंने जिम्मेदारी स्वीकार की।

इसी क्रम में, भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ में जबरन सेवानिवृत्ति का कोई चलन नहीं है। संगठन स्वयंसेवकों से जीवन भर सेवा लेता है। साथ ही, वह हर कार्यकर्ता की क्षमता का पूरा उपयोग करता है।

इसके अलावा, उन्होंने प्रचार और आत्मप्रचार पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा प्रचार अहंकार को जन्म देता है। इसलिए, संघ सीमित और संतुलित प्रचार में विश्वास करता है। उन्होंने प्रचार की तुलना बारिश से की। उन्होंने कहा कि बारिश समय और मात्रा में सही होनी चाहिए।

फिर, उन्होंने संघ के मूल उद्देश्य पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस का काम संस्कार देना है। संगठन सत्ता या प्रचार के लिए नहीं चलता। बल्कि, वह समाज निर्माण पर ध्यान देता है।

इसी बीच, भाषा को लेकर भी उन्होंने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भारतीय भाषा नहीं है। इसलिए, संघ में इसे मुख्य माध्यम नहीं बनाया जाएगा। हालांकि, जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी का उपयोग होता है। उन्होंने मातृभाषा को प्राथमिकता देने की बात कही।

इसके बाद, उन्होंने कर्नाटक का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि वहां कई लोग हिंदी नहीं समझते थे। इसलिए, उन्होंने अंग्रेजी में संवाद किया। इससे स्पष्ट होता है कि संघ व्यवहारिक सोच रखता है।

आगे बढ़ते हुए, भागवत ने समान नागरिक संहिता पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यूसीसी सभी की सहमति से बननी चाहिए। इससे समाज में मतभेद नहीं बढ़ने चाहिए।

साथ ही, उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि हर समझौते में लेन-देन होता है। इसलिए, भारत को अपने हित सुरक्षित रखने चाहिए।

इसके अलावा, उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि तकनीक को रोका नहीं जा सकता। इसलिए, लोगों को इसका मास्टर बनना होगा। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग रोजगार को नुकसान पहुंचाए बिना होना चाहिए।

इसी दौरान, उन्होंने अवैध घुसपैठ पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लोगों से ऐसे मामलों की सूचना पुलिस को देने की अपील की। उन्होंने कहा कि कम वेतन वाले कामों में भारतीयों की कमी से घुसपैठियों को मौका मिलता है।

अंत में, उन्होंने वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इससे सम्मान की गरिमा और बढ़ेगी।

कुल मिलाकर, मोहन भागवत के बयान ने संगठन की सोच और दिशा को साफ किया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि संघ में पद नहीं, सेवा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।


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