सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के इक्विटी नियमों के अमल पर रोक लगा दी। ये नियम उच्च शिक्षा में जाति भेदभाव की परिभाषा तय करते हैं। इसी के साथ अदालत ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ रुख रखा। उसने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र, समान और समावेशी माहौल जरूरी है। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि मौजूदा स्वरूप में ये नियम समाज को बांट सकते हैं। इसलिए, अदालत ने फिलहाल इन पर रोक लगाने का फैसला किया।
इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे। जब तक अदालत अंतिम फैसला नहीं सुनाती, तब तक वही व्यवस्था प्रभावी रहेगी। इस फैसले से देशभर के विश्वविद्यालयों को अस्थायी राहत मिली।
यह मामला जनहित याचिका के जरिए अदालत के सामने आया। याचिका में 2026 के नए नियमों को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि UGC ने नियम बनाते समय पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं जोड़े। उन्होंने संभावित दुरुपयोग की आशंका भी जताई।
पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। UGC ने हाल ही में इक्विटी नियमों में बदलाव किया था। नए ढांचे के तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनानी थी। इन समितियों को भेदभाव से जुड़ी शिकायतें देखने और समानता को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी मिलती।
लेकिन, याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जाति भेदभाव की परिभाषा बहुत व्यापक है। उनके मुताबिक, ऐसी अस्पष्टता से झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ सकता है। इससे शिक्षकों और प्रशासन पर अनावश्यक दबाव भी बन सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। उसने माना कि भेदभाव रोकना राज्य की अहम जिम्मेदारी है। साथ ही, अदालत ने चेताया कि कोई भी नियम सामाजिक सौहार्द को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
इसलिए, अदालत ने केंद्र और UGC से विस्तृत जवाब मांगा। अदालत यह जांच करेगी कि क्या नए नियम संविधान की भावना के अनुरूप हैं। साथ ही, वह यह भी देखेगी कि क्या नियम मौजूदा कानूनों से टकराते हैं।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश भारत सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पहले ही त्वरित सुनवाई पर सहमति दी थी। अदालत ने माना कि इन नियमों का असर लाखों छात्रों और हजारों संस्थानों पर पड़ेगा।
यह याचिकाएं मृितुंजय तिवारी ने दाखिल की हैं। उनके साथ अधिवक्ता विनीत जिंदल और राहुल दीवान भी याचिकाकर्ता हैं। उन्होंने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्थिति यथावत बनी रहेगी। विश्वविद्यालय 2012 के नियमों के तहत ही शिकायतों का निपटारा करेंगे। आगे की सुनवाई में अदालत सभी पक्षों की दलीलें सुनेगी।
आने वाले दिनों में यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और संस्थागत स्वायत्तता की दिशा तय कर सकता है। यह फैसला बताएगा कि कानून सामाजिक न्याय और सामाजिक एकता के बीच संतुलन कैसे बनाता है।