पिछले एक दशक में हिंदी फिल्म संगीत का चेहरा बदला। इसी दौर में अरिजीत सिंह उभरे। उन्होंने शोर नहीं मचाया। फिर भी उनकी आवाज़ यादों में गूंजती रही। श्रोता खुशी में भी उनके गीतों की ओर मुड़े। ग़म में भी उन्होंने उन्हीं सुरों को थामा। धीरे-धीरे अरिजीत भावनाओं की भरोसेमंद आवाज़ बन गए।
सबसे पहले दौर समझिए। 2010 के बाद बॉलीवुड में पसंद बदली। दर्शकों ने सादगी मांगी। उन्होंने सच्चाई चाही। उन्होंने निजी एहसासों से जुड़ा संगीत ढूंढा। अरिजीत इस बदलाव पर खरे उतरे। उन्होंने कम गाया। उन्होंने गहराई से गाया। नतीजतन उनकी आवाज़ अभिनय नहीं लगी, अनुभव लगी।
इसके बाद ब्रेक आया। ‘फिर मोहब्बत’ और ‘राब्ता’ ने पहचान दिलाई। लेकिन ‘तुम ही हो’ ने तस्वीर बदल दी। 2013 में ‘आशिकी 2’ का यह गीत हर जगह बजा। रेडियो पर। मोबाइल रिंगटोन में। शादियों में। ब्रेकअप के बाद की रातों में। यह गाना सिर्फ हिट नहीं हुआ। इसने एक दौर तय किया।
फिर निरंतरता आई। अरिजीत एक गीत तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने लगातार असर छोड़ा। ‘अगर तुम साथ हो’ ने रिश्तों की दूरी को छुआ। ‘चन्ना मेरेया’ ने अधूरे अलविदा को आवाज़ दी। ‘हमारी अधूरी कहानी’ ने दर्द को सादगी से रखा। हर गीत धीरे बोला। हर गीत देर तक ठहरा।
इसी बीच सोशल मीडिया ने माहौल पकड़ा। मीम्स आए। लोग बोले कि अरिजीत किसी और के ब्रेकअप का भी दर्द महसूस करा देते हैं। यह मज़ाक चला क्योंकि सच लगा। उनकी आवाज़ सहानुभूति जगाती रही। उन्होंने दर्द को चीखा नहीं। उन्होंने संकेत दिया। इसी संयम ने श्रोताओं को बांधे रखा।
हालांकि, अरिजीत सिर्फ दर्द तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने हर शैली में खुद को साबित किया। ‘नशे सी चढ़ गई’ जैसे ऊर्जावान गीत दिए। ‘समझावां’ और ‘तुझे कितना चाहने लगे’ जैसे रोमांटिक गाने गाए। भक्ति और शास्त्रीय रंग भी छुए। हर बार उन्होंने स्पष्टता और नियंत्रण बनाए रखा।
इसके अलावा तकनीक ने भूमिका निभाई। अरिजीत ने साफ उच्चारण चुना। उन्होंने खामोशी का सम्मान किया। उन्होंने शब्दों को सांस लेने दी। संगीत निर्देशकों ने इस अनुशासन को सराहा। फिल्मकारों ने भावनात्मक दृश्यों के लिए उन पर भरोसा किया। इसलिए उनके गीत अक्सर फिल्म की आत्मा बने।
साथ ही उन्होंने स्टारडम से दूरी रखी। उन्होंने दिखावे से परहेज किया। उन्होंने काम को प्राथमिकता दी। इस फैसले ने श्रोताओं से रिश्ता गहरा किया। लोगों ने ईमानदारी सुनी। उन्होंने रणनीति नहीं, संवेदना महसूस की।
फिर प्रभाव बढ़ा। हिंदी सिनेमा से बाहर भी उनकी आवाज़ पहुंची। क्षेत्रीय भाषाओं ने उन्हें अपनाया। वैश्विक श्रोताओं ने उन्हें स्ट्रीम किया। कॉन्सर्ट में भारी भीड़ जुटी। फिर भी अनुभव निजी रहा। एक आवाज़। एक भावना। लाखों अकेले श्रोता।
आज अरिजीत का संगीत एक पीढ़ी की डायरी लगता है। इसमें मिला प्यार है। टूटा प्यार है। यादों में बसा प्यार है। उनके गीत लंबी ड्राइव में साथ चलते हैं। खामोश रातों में ठहरते हैं। बदलाव के वक्त सहारा बनते हैं।
अंत में विरासत साफ दिखती है। रुझान बदलेंगे। नई आवाज़ें आएंगी। फिर भी अरिजीत सिंह ने एक दुर्लभ जगह भर दी है। उन्होंने टूटन को गरिमा दी। उन्होंने रोमांस को संयम दिया। और सबसे अहम, उन्होंने उन भावनाओं को आवाज़ दी, जिन्हें कहना मुश्किल था।