डावोस में ट्रंप ने पेश किया ‘बोर्ड ऑफ पीस’, भारत रहा दूर; संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर उठे सवाल
khabarworld 23/01/2026 0
डावोस में भारत की गैरमौजूदगी चर्चा में रही। गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा की। ट्रंप ने इस मंच को गाजा में शांति के प्रयासों से जोड़ा। हालांकि, इसके व्यापक अधिकार क्षेत्र ने तुरंत सवाल खड़े कर दिए।
सबसे पहले, भारत की अनुपस्थिति साफ दिखी। ट्रंप ने पिछले सप्ताह करीब 60 देशों को न्योता भेजा था। भारत को भी आमंत्रण मिला। फिर भी, भारतीय प्रतिनिधि समारोह में शामिल नहीं हुए। सूत्रों के अनुसार, भारत ने अब तक बोर्ड में शामिल होने पर फैसला नहीं किया है।
इसी दौरान, वैश्विक स्तर पर भी समर्थन सीमित रहा। अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई स्थायी सदस्य बोर्ड से नहीं जुड़ा। जी-7 देशों में भी सिर्फ अमेरिका ने भागीदारी दिखाई। इससे बोर्ड की वैधता और उद्देश्य पर बहस तेज हो गई।
डावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान ट्रंप ने हस्ताक्षर समारोह की अगुवाई की। उन्होंने अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को दोहराया। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने नौ महीनों में आठ युद्ध रोके। इसमें भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले साल मई में हुआ तनाव भी शामिल बताया।
इस बीच, पाकिस्तान की मौजूदगी खास रही। पाकिस्तान उन 19 देशों में शामिल रहा, जिन्होंने समारोह में भाग लिया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। ट्रंप ने कहा कि शरीफ ने उन्हें लाखों जिंदगियां बचाने का श्रेय दिया। समारोह में पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर भी मौजूद रहे।
हालांकि, भारत ने ट्रंप के दावे खारिज कर दिए। नई दिल्ली ने साफ कहा कि भारत-पाक तनाव चार दिन में खत्म हुआ। दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों ने आपसी बातचीत से स्थिति संभाली। भारत ने किसी तीसरे पक्ष की भूमिका से इनकार किया।
इसके अलावा, बोर्ड के आधिकारिक चार्टर ने भी चिंताएं बढ़ाईं। दस्तावेज में गाजा का सीधा उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, चार्टर ने एक व्यापक और खुला जनादेश तय किया। इसमें कहा गया कि बोर्ड संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में स्थिरता और स्थायी शांति को बढ़ावा देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भूमिका मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से टकरा सकती है।
ट्रंप के बयान ने इन आशंकाओं को और बल दिया। उन्होंने कहा कि गाजा में सफलता के बाद बोर्ड अन्य वैश्विक संकटों पर भी काम करेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ काम कर सकता है। फिर भी, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जिन युद्धों को उन्होंने रोका, उनमें संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं रही।
अब तक, 11 देशों के राष्ट्राध्यक्षों या सरकार प्रमुखों ने बोर्ड के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इनमें अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, पैराग्वे और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। इसके अलावा, बहरीन, जॉर्डन, मोरक्को, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, यूएई और मंगोलिया के वरिष्ठ अधिकारी भी प्रक्रिया में शामिल हुए।
इसी बीच, भारत ने अपने प्रमुख साझेदारों के रुख पर नजर रखी। फ्रांस और रूस जैसे देशों की स्थिति को भी ध्यान से देखा गया। सूत्रों के अनुसार, भारत को चिंता है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकता है। साथ ही, ट्रंप के स्थायी अध्यक्ष बने रहने की संभावना भी सवालों के घेरे में है।
गाजा योजना पर भी विवाद बना रहा। ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर ने गाजा के विकास की रूपरेखा रखी। उन्होंने आर्थिक पुनर्निर्माण पर जोर दिया। हालांकि, उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य के भविष्य पर कोई बात नहीं की। यह गाजा कार्यकारी बोर्ड, इजरायल-हमास समझौते के दूसरे चरण से जुड़ा है। पहले चरण का युद्धविराम अक्टूबर में हुआ था, लेकिन हिंसा की घटनियां जारी रहीं।
आगे देखते हुए, भारत अपनी कूटनीति सक्रिय रखेगा। 30 और 31 जनवरी को नई दिल्ली में अरब लीग के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी। भारत वहां गाजा और पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा करेगा। गुरुवार को विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा ने अरब लीग देशों के राजदूतों से मुलाकात की। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फरवरी में इजरायल दौरे की संभावना भी है। यह यात्रा क्षेत्रीय हालात पर विचार-विमर्श का मंच दे सकती है।
