कोपेनहेगन ने ग्रीनलैंड पर बढ़ते तनाव के बीच सख्त रुख दिखाया। इसलिए डेनमार्क ने साफ संदेश दिया। कोई भी विदेशी ताकत उसकी जमीन पर कदम रखेगी। सैनिक तुरंत जवाब देंगे। वे आदेश का इंतजार नहीं करेंगे।
सबसे पहले, डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने कहा कि सैनिक घुसपैठ देखते ही फायर खोलेंगे। यह निर्देश आज भी लागू है। यह नियम शीत युद्ध के दौर का है। मंत्रालय ने यह जानकारी स्थानीय अख़बार बर्लिंग्सके को दी।
इसके बाद, मंत्रालय ने इस आदेश की पृष्ठभूमि बताई। अप्रैल 1940 में नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला किया था। उस समय संचार व्यवस्था चरमरा गई थी। तभी यह निर्देश बना। तब से यह नियम कायम है। उद्देश्य साफ है। किसी भी हमले का त्वरित जवाब।
इसी बीच, ग्रीनलैंड में सैन्य जिम्मेदारी संयुक्त आर्कटिक कमांड संभालता है। यह कमांड तय करेगा कि किस स्थिति को हमला माना जाए। यानी अंतिम आकलन यही संस्था करेगी। डेनमार्क ने यह भी कहा कि सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा।
उधर, अमेरिका की नजरें ग्रीनलैंड पर टिकी हैं। इसलिए विवाद गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार सख्त बयान दिए। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका बल प्रयोग करेगा। उनका तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम है। उन्होंने रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी का हवाला दिया।
इसके अलावा, ट्रंप ने न्यूयॉर्क टाइम्स से बात की। उन्होंने कहा कि केवल समझौता काफी नहीं होगा। उनका कहना है कि पूर्ण स्वामित्व से ही रणनीतिक लाभ मिलता है। उनके शब्दों में, मालिकाना हक वह ताकत देता है जो किसी संधि से नहीं मिलती।
हालांकि, अमेरिका 1951 की संधि का हिस्सा है। यह संधि अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने बनाने की अनुमति देती है। इसके लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति जरूरी होती है। लेकिन यह संधि स्वामित्व नहीं देती।
इसी कारण, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने बार-बार रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कड़ा बयान दिया। उन्होंने चेताया कि सैन्य कब्जे की कोशिश नाटो को खत्म कर देगी। उन्होंने साफ कहा कि नाटो देश पर हमला पूरे गठबंधन को रोक देगा।
वहीं, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वॉशिंगटन का पक्ष रखा। उन्होंने फॉक्स न्यूज से कहा कि डेनमार्क ने पर्याप्त सुरक्षा कदम नहीं उठाए। उनके अनुसार, ग्रीनलैंड वैश्विक सुरक्षा का आधार बन सकता है। उन्होंने मिसाइल रक्षा में इसकी भूमिका पर जोर दिया।
इस बीच, कूटनीति भी तेज हुई। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के दूत वॉशिंगटन पहुंचे। उन्होंने व्हाइट हाउस के अधिकारियों से मुलाकात की। उनका लक्ष्य तनाव कम करना है। वे अमेरिकी सांसदों और प्रशासन को योजना से पीछे हटने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं।
अंत में, अगले कदम पर नजरें टिकी हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अगले हफ्ते डेनिश अधिकारियों से मिल सकते हैं। फिलहाल, डेनमार्क ने अपना संदेश दे दिया है। उसकी जमीन पर कोई खतरा आया। जवाब तुरंत मिलेगा। बातचीत बाद में होगी।