“तानाशाह को मौत” के नारों से गूंजा ईरान, इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ भड़के नए प्रदर्शन
ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ गुस्सा एक बार फिर सड़कों पर फूट पड़ा है। तेहरान समेत कई शहरों में हजारों लोग प्रदर्शन पर उतरे। उन्होंने सीधे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को निशाने पर लिया। प्रदर्शनकारियों ने महंगाई, बेरोज़गारी और दमन के लिए शासन को जिम्मेदार ठहराया।
सबसे पहले, गुरुवार रात राजधानी तेहरान में हालात बदले। जैसे ही रात बढ़ी, गलियों और रिहायशी इलाकों में नारे गूंजने लगे। लोग चिल्लाए, “तानाशाह को मौत” और “इस्लामिक रिपब्लिक को मौत।” कई जगहों पर “आजादी, आजादी” के नारे भी सुनाई दिए।
इसके तुरंत बाद सरकार ने सख्त कदम उठाए। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। अंतरराष्ट्रीय फोन कॉल भी रोक दिए गए। साथ ही, न्यायपालिका और सुरक्षा बलों के प्रमुखों ने कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी।
इसी बीच, इन प्रदर्शनों को निर्वासित क्राउन प्रिंस रज़ा पहलवी के आह्वान से जोड़कर देखा गया। पहलवी ने लोगों से गुरुवार और शुक्रवार रात 8 बजे सड़कों पर उतरने को कहा था। समय होते ही तेहरान के कई इलाकों में नारे शुरू हो गए।
गवाहों के अनुसार, हजारों लोग सड़कों पर दिखे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने ईरान के पूर्व शाह के समर्थन में नारे लगाए। उन्होंने कहा, “यह आखिरी लड़ाई है” और “पहलवी लौटेंगे।” कभी ऐसे नारे मौत की सजा तक दिला सकते थे। अब वही नारे गुस्से की गहराई दिखाते हैं।
इसके बाद अचानक संचार व्यवस्था ठप हो गई। इंटरनेट बंद हुआ। लैंडलाइन काम नहीं कर पाईं। इसी पर रज़ा पहलवी ने बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता ने आज़ादी मांगी और जवाब में शासन ने चुप्पी थोप दी।
पहलवी ने आरोप लगाया कि सरकार सैटेलाइट सिग्नल जाम करने की भी कोशिश कर सकती है। उन्होंने यूरोपीय नेताओं से अपील की कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर ईरानी शासन पर दबाव डालें। उन्होंने कहा कि ईरानियों की आवाज़ को दबने न दिया जाए।
हालांकि, पहलवी की भूमिका को लेकर सवाल बने हुए हैं। इज़रायल के प्रति उनके समर्थन को लेकर पहले भी आलोचना हुई है, खासकर जून में हुए 12 दिन के संघर्ष के बाद। यह भी साफ नहीं है कि शाह के समर्थन में नारे रज़ा पहलवी के लिए हैं या 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले के दौर की याद में हैं।
इस बीच, प्रदर्शन केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहे। देश के कई शहरों और कस्बों में विरोध फैल गया। बाजार और बाज़ारें बंद रहीं। दुकानदारों ने शटर गिराकर समर्थन जताया।
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, हिंसा में अब तक कम से कम 42 लोगों की मौत हो चुकी है। सुरक्षा बलों ने 2,270 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया है। मानवाधिकार संगठनों ने वास्तविक संख्या और अधिक होने की आशंका जताई है।
इंटरनेट निगरानी संस्थाओं ने भी सरकार पर उंगली उठाई। क्लाउडफ्लेयर और नेटब्लॉक्स ने पुष्टि की कि ईरान में इंटरनेट बंदी सरकारी हस्तक्षेप के कारण हुई। दुबई से ईरान फोन मिलाने की कोशिश भी नाकाम रही। अतीत में ऐसे ब्लैकआउट के बाद कठोर दमन देखने को मिला है।
हालांकि, ये प्रदर्शन किसी एक नेता के इर्द-गिर्द संगठित नहीं हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यही कमजोरी पहले के आंदोलनों को भी ले डूबी। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की सुरक्षा एजेंसियों ने संभावित नेताओं को गिरफ्तार, प्रताड़ित या निर्वासित कर दिया।
प्रदर्शन की जड़ में आर्थिक संकट है। पिछले महीने तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से यह आंदोलन शुरू हुआ। व्यापारियों ने मुद्रा के गिरते मूल्य के खिलाफ आवाज उठाई। इसके बाद असंतोष पूरे देश में फैल गया।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में महंगाई दर 52 प्रतिशत पहुंच गई। ईरानी रियाल ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। एक डॉलर की कीमत करीब 14 लाख रियाल हो गई है। आम लोगों के लिए जीवन यापन मुश्किल होता जा रहा है।
सरकार ने आर्थिक संकट को स्वीकार किया है। फिर भी, उसने विदेशी ताकतों पर आंदोलन भड़काने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने प्रदर्शनकारियों की “वाजिब मांगों” को माना। उन्होंने हालात सुधारने की बात कही, लेकिन मुद्रा पर नियंत्रण की सीमाएं भी गिनाईं।
सुरक्षा एजेंसियों ने सख्ती बढ़ाई है। एक कट्टरपंथी अखबार ने दावा किया कि ड्रोन से प्रदर्शनकारियों की पहचान होगी। अलग-अलग प्रांतों में सुरक्षा कर्मियों की मौत की खबरें भी सामने आई हैं।
ईरान पहले भी कई बार ऐसे विरोध देख चुका है। प्रतिबंध, युद्ध और आर्थिक बदहाली ने जनता के धैर्य को तोड़ा है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि सरकार कितनी सख्ती दिखाएगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजरें टिकी हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या की तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा।
अब ईरान एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखता है। सड़कों पर गुस्सा है। सत्ता पर दबाव है। आगे का रास्ता अभी अनिश्चित है।
