यह फैसला दूरगामी असर लाता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रदूषक रहा है। अब वह वैश्विक जलवायु समझौते से पूरी तरह बाहर जाता है। वह वैज्ञानिक आकलन की प्रक्रिया भी छोड़ता है। नतीजतन, वह उत्सर्जन घटाने की साझा जिम्मेदारी नहीं निभाता। साथ ही वह विकासशील देशों को जलवायु वित्त देने से भी दूरी बनाता है। ये देश ऊर्जा संक्रमण, अनुकूलन और शमन के लिए मदद पर निर्भर रहते हैं।
जलवायु विशेषज्ञ तीखी प्रतिक्रिया देते हैं। यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स की नीति निदेशक रेचल क्लीटस इस कदम की आलोचना करती हैं। वह इसे नई गिरावट बताती हैं। वह कहती हैं कि यह फैसला लोगों की भलाई को नुकसान पहुंचाता है। वह वैश्विक सहयोग को अस्थिर करता है। उनके अनुसार, जलवायु प्रभाव तेज़ी से बढ़ते हैं। बाढ़, आग और हीटवेव लागत बढ़ाते हैं। इसलिए सामूहिक कार्रवाई ही सुरक्षित भविष्य का रास्ता दिखाती है।
क्लीटस प्रशासन की नीति पर सवाल उठाती हैं। वह कहती हैं कि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों को नकारती है। वह स्वच्छ ऊर्जा नीतियों पर हमला करती है। वह जीवाश्म ईंधन उद्योग को तरजीह देती है। उनके मुताबिक, यह रुख अमेरिका के लोगों के हितों के खिलाफ जाता है।
आर्थिक विशेषज्ञ भी चिंता जताते हैं। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के डेविड विडाव्स्की इसे रणनीतिक भूल कहते हैं। वह याद दिलाते हैं कि UNFCCC 30 साल पुरानी आधारशिला है। यह वैश्विक सहयोग को दिशा देती है। अमेरिका इससे बाहर जाता है, तो वह मैदान छोड़ देता है। तब अमेरिकी समुदाय और कंपनियां अवसर खोती हैं। अन्य देश स्वच्छ ऊर्जा में नौकरियां और निवेश खींच लेते हैं।
इसके बावजूद, वैश्विक कूटनीति आगे बढ़ती है। अन्य देश सहयोग जारी रखने का संकेत देते हैं। वे कहते हैं कि UNFCCC की भूमिका अपूरणीय है। जलवायु पर मिलकर काम करने से जानें बचती हैं। रोजगार बनते हैं। आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है। इसलिए वे रास्ता नहीं बदलते।
आंकड़े बहस को संदर्भ देते हैं। 2022 तक चीन सबसे बड़ा CO2 उत्सर्जक रहा। उसके बाद अमेरिका आता है। फिर भारत, रूस और जापान का स्थान है। लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में अमेरिका शीर्ष पर रहता है। WRI के अनुसार, अमेरिका का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन चीन से दोगुना है। यह भारत से आठ गुना अधिक है। इसलिए जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं।
यह फैसला परंपरा तोड़ता है। अमेरिका ने पहले कभी UNFCCC नहीं छोड़ा। दुनिया का हर देश इस संधि का हिस्सा है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों सरकारें इसे दशकों तक मानती रहीं। पेरिस समझौते से बाहर जाने का संकेत पहले ही आ चुका है। अब यह कदम और आगे जाता है।
आलोचक इसे व्यापक रुख का हिस्सा बताते हैं। वे कहते हैं कि प्रशासन वैश्विक समझौतों को कमजोर करता है। अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करता है। इससे भरोसा घटता है। सहयोगी देश रिश्तों पर फिर से विचार करते हैं।
अब आगे क्या होगा? अमेरिकी एजेंसियां वापसी की प्रक्रिया शुरू करती हैं। राज्य और शहर अपनी जलवायु नीतियां आगे बढ़ाते हैं। कंपनियां स्वच्छ ऊर्जा में निवेश जारी रखती हैं। दुनिया तापमान बढ़ते देखती है। बहस तेज़ होती है। नेतृत्व और जिम्मेदारी का सवाल और गहरा होता है।