वॉशिंगटन फिर दबाव बढ़ाता है। डोनाल्ड ट्रंप रूसी तेल पर नई पाबंदियों का रास्ता खोलते हैं। वह देशों को खुला संदेश देते हैं। “रूसी तेल खरीदो, तो भारी कीमत चुकाओ।” इसलिए भारत और चीन पर नज़रें टिकती हैं। दोनों देश सस्ती आपूर्ति लेते हैं। दोनों देश अपनी ऊर्जा जरूरतें संभालते हैं।
अब ट्रंप तेज़ कदम उठाते हैं। वह द्विदलीय प्रतिबंध बिल को मंजूरी देते हैं। फिर वह इसे कांग्रेस के एजेंडे में धकेलते हैं। कानून 500% तक टैरिफ का विकल्प देता है। साथ ही यह रूसी यूरेनियम पर भी सख्ती लाता है। सीनेटर लिंडसे ग्राहम इस रणनीति की अगुवाई करते हैं। वह कहते हैं, ट्रंप इस कानून से “जबर्दस्त दबदबा” हासिल करते हैं। फिर वह देशों को रूस से दूरी बनाने के लिए कहते हैं। कारण साफ़ है। तेल से आने वाला पैसा यूक्रेन युद्ध को ताकत देता है।
इसी बीच ट्रंप अलग रास्ता प्रस्तावित करते हैं। वह व्यापक प्रतिबंधों के बजाय टैरिफ बढ़ाने की बात करते हैं। कांग्रेस नेतृत्व इस संकेत को पढ़ता है। फिर वे वोट आगे नहीं बढ़ाते। वे ट्रंप को अधिक विकल्प देना चाहते हैं। इसलिए बाजार अनिश्चितता देखता है। भारतीय निर्यातक चिंता गिनते हैं।
पिछले साल ट्रंप ने टैरिफ युद्ध तीखा किया। वह भारतीय सामान पर 25% “रिसिप्रोकल” ड्यूटी लगाते हैं। फिर वह रूसी तेल खरीद पर 25% जुर्माना जोड़ते हैं। नतीजे में कुछ उत्पादों पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंचते हैं। इससे दिल्ली–वॉशिंगटन रिश्तों में खिंचाव आता है। व्यापार समुदाय बेचैनी महसूस करता है।
उधर चीन के साथ तनाव और बढ़ता है। अमेरिका कई चीनी उत्पादों पर 145% ड्यूटी ठोकता है। चीन 125% टैरिफ के साथ पलटवार करता है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ झटके झेलती हैं। कंपनियाँ लागत बढ़ने की कहानी लिखती हैं।
अब ट्रंप फिर भारत पर बात करते हैं। वह कहते हैं, “प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि मुझे यह पसंद नहीं।” वह मोदी की तारीफ भी करते हैं। लेकिन वह चेतावनी भी जोड़ते हैं। “मैं टैरिफ बहुत जल्दी बढ़ा सकता हूँ।” फिर वह अमेरिकी किसानों की शिकायत का हवाला देते हैं। वह भारतीय चावल पर भी सख्ती की बात करते हैं। इसलिए संकेत साफ़ रहता है। भारत को रूस पर रुख बदलने के लिए दबाव मिलता है।
वार्ताएँ रुकी रहती हैं। भारत और अमेरिका कृषि और टैरिफ पर सहमति नहीं खोजते। अमेरिका अपने किसानों के लिए बड़ा बाज़ार चाहता है। भारत अपने किसानों और डेयरी क्षेत्र को सुरक्षा देता है। सरकार कहती है, ग्रामीण आय प्राथमिकता लेती है। इसलिए दोनों पक्ष समाधान तक नहीं पहुँचते।
फिर भी भारत रूसी तेल लेता है। सस्ता दाम बजट संभालता है। महंगाई काबू में रहती है। ऊर्जा आपूर्ति स्थिर रहती है। लेकिन जोखिम बढ़ता है। अगर अमेरिका 500% टैरिफ लाता है, तो भारतीय निर्यात पर चोट पड़ती है। कंपनियाँ नई रणनीति ढूंढती हैं। उपभोक्ता भी दाम बढ़ने का असर महसूस करते हैं।
अब नज़र अगले कदम पर रहती है। अगर कांग्रेस बिल को आगे बढ़ाती है, तो ट्रंप के हाथ मज़बूत होते हैं। अगर भारत कूटनीति तेज़ करता है, तो तनाव कम होता है। फिर भी दांव बड़ा रहता है। यह दौर भारत की व्यापार नीति, ऊर्जा विकल्प और अमेरिका के साथ रिश्तों को दिशा देता है।