वीडियो से खुली पीड़ा: हिमाचल की छात्रा ने सुनाई यौन शोषण की दास्तान, फिर मौत ने सब कुछ रोक दिया
दिल्ली नहीं, इस बार सुर्खियाँ हिमाचल से आती हैं। एक 19 वर्षीय छात्रा कॉलेज जाती है। फिर वह डर महसूस करती है। आगे चलकर उसकी ज़िंदगी अचानक बदल जाती है।
पहले वरिष्ठ छात्र उसे घेरते हैं। वे उस पर दबाव डालते हैं। वे उसे धमकाते हैं। इसके बाद हालात और बिगड़ते हैं। अब कॉलेज का एक प्रोफेसर सामने आता है। छात्रा उस पर अनुचित हरकतों का आरोप लगाती है। वह कहती है — “सर अजीब हरकतें करते थे।”
इसी बीच, छात्रा बीमार पड़ती है। वह इलाज के लिए धर्मशाला पहुँचती है। डॉक्टर उपचार शुरू करते हैं। परिवार उसके साथ खड़ा रहता है। वह डर बयान करती है। वह रैगिंग बताती है। वह यौन शोषण का हवाला देती है। धीरे-धीरे उसकी हालत गिरती है। अंततः वह 26 दिसंबर को लुधियाना में दम तोड़ देती है। यह खबर पूरे हिमाचल को झकझोर देती है।
अब मामला कानूनी मोड़ लेता है। उसके पिता शिकायत दर्ज कराते हैं। वे तीन छात्राओं के नाम बताते हैं— हर्षिता, आकृति और कोमोलिका। वे कहते हैं कि इन तीनों ने मारपीट की। फिर वे प्रोफेसर अशोक कुमार पर “अश्लील हरकतें” करने का आरोप लगाते हैं।
इसी दौरान एक वीडियो सामने आता है। वीडियो अस्पताल का है। छात्रा बिस्तर पर बैठती है। वह बोलती है। वह प्रोफेसर पर लगातार दबाव बनाने का आरोप लगाती है। वह कहती है, “पीछे पड़ जाते थे, अजीब हरकतें करते थे।” आगे वह जोड़ती है, “टच करते थे, बहुत कुछ बोलते थे।”
इधर पुलिस सक्रिय होती है। अधिकारी रिकॉर्ड खंगालते हैं। वे मेडिकल दस्तावेज देखते हैं। वे वीडियो सुनते हैं। वे गवाहों के बयान लेते हैं। वे मामला आगे बढ़ाते हैं। साथ ही पुलिस क़ानूनी धाराएँ जोड़ती है। यौन उत्पीड़न, चोट पहुँचाने और रैगिंग विरोधी कानून के प्रावधान लागू होते हैं।
फिर कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। प्रोफेसर आरोपों से इनकार करता है। कुछ शिक्षक उसका समर्थन करते हैं। वह कहता है कि छात्रा पहले उसके अंडर पढ़ चुकी थी। लेकिन मौजूदा सत्र में वह उसकी छात्रा नहीं थी।
अब पुलिस पृष्ठभूमि खंगालती है। जाँच से पता चलता है कि छात्रा ने 2024 में कॉलेज जॉइन किया। फिर उसे रैगिंग झेलनी पड़ी। बाद में वह बी.ए. के पहले वर्ष में फेल हो जाती है। इसके बाद वह कॉलेज से दूरी बना लेती है। फिर अगस्त 2025 में उसका नाम कॉलेज से हट जाता है।
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती। सितंबर में वह फिर कॉलेज जाती है। वह दोबारा एडमिशन चाहती है। कॉलेज उसे नियम बताता है। प्रशासन कहता है — पहले री-इवैल्यूएशन क्लीयर करो, फिर दूसरे वर्ष में प्रवेश मिलेगा। वरना पहले वर्ष से शुरू करो।
अब सवाल उठते हैं। आखिर छात्रा पर इतना दबाव क्यों बना? कॉलेज ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए? और, क्या यह मामला सिर्फ रैगिंग तक सीमित रहा या सिस्टम पूरी तरह चूका?
फिलहाल, परिवार न्याय चाहता है। पुलिस जाँच आगे बढ़ाती है। समाज इस कहानी से सबक लेता है। और एक सवाल हवा में तैरता रहता है — अगर कोई समय पर सुने, तो क्या ऐसी त्रासदियाँ रुक सकती हैं?
