बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया का 80 वर्ष की उम्र में निधन
खालिदा ज़िया ने मंगलवार को ढाका में दम तोड़ा। डॉक्टरों ने परिवार और पार्टी नेताओं को यह खबर दी। उनकी उम्र 80 वर्ष रही। पहले कई दिनों तक डॉक्टरों ने उन्हें गंभीर निगरानी में रखा। फिर हालात बिगड़े। अंततः डॉक्टरों ने सभी कोशिशें रोक दीं और परिजनों को जानकारी दी। वहीं, बीएनपी नेताओं ने अस्पताल पहुँचे समर्थकों को स्थिति समझाई।
लंबे समय से बीमारी उनके शरीर को कमजोर करती रही। डॉक्टर उनकी लिवर सिरोसिस, गठिया, डायबिटीज और दिल-फेफड़ों की जटिलताओं का इलाज करते रहे। हर हफ्ते दवाएँ बदलती रहीं। फिर भी दर्द बना रहा। 11 दिसंबर को डॉक्टरों ने वेंटिलेटर पर रखा। उन्होंने उम्मीद कायम रखी। लेकिन हालत लगातार गिरती चली गई।
इस बीच, परिवार ने विदेश में इलाज का विकल्प खोजा। समर्थक नेताओं ने कतर से चार्टर्ड विमान की तैयारी की। डॉक्टरों ने जोखिम का आकलन किया। फिर उन्होंने साफ कहा—लंबी उड़ान मरीज के लिए सुरक्षित नहीं रहेगी। इसलिए परिवार ने ढाका में ही इलाज जारी रखा।
इसी दौर में चुनावी हलचल भी जारी रही। सोमवार को बीएनपी कार्यकर्ताओं ने बोगुरा-7 सीट के लिए उनके नामांकन पत्र जमा किए। पार्टी ने यह कदम प्रतीक के तौर पर उठाया। दूसरी ओर, उनका बेटा तौकीर रहमान निर्वासन के 17 साल बाद ढाका लौटा। पार्टी कार्यकर्ता अब उसे बड़े नेता के रूप में देखने लगे। वह ढाका-17 और बोगरा-6 से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। रविवार को उसने अस्पताल पहुँचकर माँ के साथ दो घंटे बिताए।
अब उनके जीवन पर नज़र डालते हैं। 1991 में मतदाताओं ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया। फिर 2001 में लोगों ने दोबारा जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने प्रशासन को स्थिर करने की कोशिश की। साथ-साथ, उन्होंने महिला नेतृत्व का नया रास्ता खोला। इससे पहले मुस्लिम देशों में केवल बेनज़ीर भुट्टो ने यह ऊँचाई छुई।
उनकी राजनीतिक यात्रा घर से शुरू हुई। उनके पति जियाउर रहमान ने 1977 में बीएनपी खड़ी की। 1981 में हत्या के बाद पार्टी ने खालिदा ज़िया पर भरोसा जताया। 1984 में नेताओं ने उन्हें चेयरपर्सन बनाया। फिर उन्होंने एच.एम. अर्शाद की सैन्य हुकूमत के खिलाफ आंदोलन तेज किया। पुलिस ने कई बार उन्हें हिरासत में लिया। फिर भी उन्होंने पीछे हटने से इनकार किया। 1990 में जनविद्रोह उठा। अर्शाद ने सत्ता छोड़ी। अगले चुनाव में मतदाताओं ने खालिदा ज़िया को स्पष्ट समर्थन दिया।
हालांकि, आगे रास्ता कठिन रहा। 1996 में वे लौटीं, लेकिन विरोध और हड़तालों ने सरकार को कमजोर किया। फिर 1999 में बीएनपी ने गठबंधन बनाया और विरोध तेज किया। 2001 में वे फिर सत्ता में आईं। 2006 में उन्होंने पद छोड़ा। अगले ही साल भ्रष्टाचार मामलों में एजेंसियाँ उन पर आरोप लेकर पहुँचीं और अदालतों में मुकदमे चले।
इसके बावजूद, उनके कुछ फैसले आज भी चर्चा में रहते हैं। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को मजबूत किया। लड़कियों के लिए फीस-मुक्त पढ़ाई शुरू की। छात्रवृत्ति और फ़ूड-फॉर-एजुकेशन कार्यक्रम आगे बढ़ाए। साथ-साथ, सरकार में नौकरी के लिए आयु सीमा बढ़ाकर 30 वर्ष की।
आज बांग्लादेश उनकी मौत पर विचार कर रहा है। नेता बयान दे रहे हैं। समर्थक यादें बाँट रहे हैं। वहीं, बीएनपी चुनावी रणनीति पर नए सिरे से सोच रही है। तौकीर रहमान आगे बढ़ रहा है। उधर, सत्तारूढ़ दल अपनी तैयारी तेज कर रहा है। इस तरह राजनीति फिर नए मोड़ की तरफ बढ़ रही है।
खालिदा ज़िया चली गईं। लेकिन उनकी विरासत, उनकी लड़ाई और उनके फैसले—अब भी बांग्लादेश के भविष्य पर असर डालते रहेंगे।
