रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन फिर चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं, यूक्रेन बातचीत से पीछे हटता है। इसलिए रूस अपने सभी सैन्य लक्ष्य हर हाल में हासिल करता है। वे साफ कहते हैं, “या तो शांति, या फिर बल।”
इस बीच रूस मोर्चे पर दबाव बढ़ाता है। इसके साथ ही हमले तेज होते हैं। ड्रोन और मिसाइलें कई शहरों को निशाना बनाती हैं। लोग डर के बीच रात गुजारते हैं। फिर सुबह खबरें आती हैं। हताहत बढ़ते हैं। परिवारों में बेचैनी फैलती है।
उधर, कीव पलटवार करता है। राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की हालात का आकलन करते हैं। वे कहते हैं, रूस शांति में दिलचस्पी नहीं दिखाता। इसलिए यूक्रेन रक्षा मजबूत करता है। वह अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी तलाशता है। अब वह हर मंच पर सहयोग मांगता है।
फिर एक और मोर्चा खुलता है। ज़ेलेंस्की अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात तय करते हैं। वे फ़्लोरिडा में बातचीत की योजना बनाते हैं। दोनों नेता युद्ध के रास्ते और विकल्पों पर चर्चा करते हैं। वे सुरक्षा गारंटी पर बात करते हैं। वे विवादित इलाकों पर भी तर्क रखते हैं।
हालांकि, पुतिन अलग संदेश भेजते हैं। वे कहते हैं, कीव की नेतृत्व टीम जल्दबाज़ी नहीं दिखाती। इसलिए रूस इंतज़ार नहीं करता। वह आगे बढ़ता है। वह अपनी “विशेष सैन्य कार्रवाई” को निर्णायक बनाने की कोशिश करता है।
पहले क्रेमलिन पुतिन को अग्रिम मोर्चे के कमांड पोस्ट पर ले जाता है। वहां जनरल वलेरी गेरेसिमोव स्थिति समझाते हैं। कमांडर जमीनी रिपोर्ट रखते हैं। वे डोनेट्स्क और ज़ापोरिझझिया के इलाकों पर चर्चा करते हैं। बाद में रूसी अधिकारी दावे दोहराते हैं। वे कहते हैं, सेना नए इलाकों पर नियंत्रण जमाती है।
अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया तेज होती है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी साफ रुख लेते हैं। वे रूस के हमलों को “बर्बर” बताते हैं। वे कहते हैं, टिकाऊ शांति के लिए रूस को सहयोग दिखाना होगा। साथ ही वे कनाडा से नई आर्थिक मदद की घोषणा करते हैं। 2.5 अरब कनाडाई डॉलर यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं। यह धन पुनर्निर्माण की शुरुआत को गति देता है।
लेकिन युद्ध जारी रहता है। सीमाओं पर तनाव बढ़ता है। शहर टूटे ढांचे के साथ जूझते हैं। बच्चे स्कूलों से दूर रहते हैं। किसान खेतों में जोखिम उठाते हैं। और लोग हर दिन अनिश्चितता झेलते हैं।
फिर भी कूटनीति रास्ता खोजती है। ज़ेलेंस्की शांति के लिए प्रस्ताव रखते हैं। वे कहते हैं, बातचीत देश को राहत देती है। लेकिन वे यह भी कहते हैं, यूक्रेन समर्पण स्वीकार नहीं करता। इसलिए सेना डटी रहती है।
अब दुनिया देखती है। ट्रंप-ज़ेलेंस्की मुलाकात नए संकेत भेजती है। मित्र देशों में उम्मीद उठती है। वहीं, पुतिन दबाव बनाए रखते हैं। वे ताकत और वार्ता—दोनों को साथ रखकर खेल बदलने की कोशिश करते हैं।
आखिर में सवाल वही रहता है। क्या बातचीत युद्ध को रोकती है? या फिर गोलियां जवाब देती हैं? इस मोड़ पर दोनों पक्ष दांव बढ़ाते हैं। और दुनिया शांति की राह का इंतज़ार करती है।