कांग्रेस कार्यसमिति ने रणनीति पर फोकस बढ़ाया, G-RAM-G कानून पर सख्त रुख

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कांग्रेस की शीर्ष टीम शनिवार को नई दिल्ली में एक साथ बैठी। माहौल गंभीर रहा। लक्ष्य साफ रहा। पार्टी ने अगले साल की चुनावी रणनीति पर बात शुरू की। फिर नेताओं ने सीधे G-RAM-G कानून पर चर्चा बढ़ाई। यह कानून मनरेगा की जगह लेता है। इसलिए नेतृत्व ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा माना।

सबसे पहले गांधी परिवार पहुँचा। इसके बाद शशि थरूर आए। फिर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए। सभी ने हॉल में अपनी-अपनी बात रखी। बैठक ने स्पष्ट संदेश दिया। पार्टी अब टकराव से नहीं बचेगी। बल्कि वह मुद्दों पर खुलकर बोलेगी।

अब पृष्ठभूमि समझें। मनरेगा ने सालों तक ग्रामीण भारत को सहारा दिया। कानून ने हर घर को 100 दिन का रोजगार दिया। लोगों ने इसे जीवन से जोड़ा। लेकिन G-RAM-G ने ढांचा बदल दिया। अब सरकार 125 दिन का काम देती है। फिर भी वित्तीय बोझ राज्यों पर आ गया। इसलिए राज्यों ने चिंता जताई। और कांग्रेस ने मौके को राजनीतिक लड़ाई में बदला।

बैठक में नेताओं ने कहा कि सरकार जनता से दूरी बढ़ा रही है। पार्टी अब गाँव-गाँव जाएगी। वह कानून की कमजोरियाँ समझाएगी। फिर वह समर्थन जुटाएगी। हालांकि रिकॉर्ड चिंता पैदा करता है। कांग्रेस कई बार अभियान शुरू करती है। लेकिन वह गति नहीं बनाए रखती। जीएसटी और राफेल इसके उदाहरण बने। इसलिए इस बार नेतृत्व ने योजना को जमीन पर टिकाने की बात की।

इसके बाद दूसरा मुद्दा आया। राष्ट्रीय हेराल्ड केस फिर सामने आया। अदालत ने हाल में एक याचिका खारिज की। फिर ईडी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव कहा। पार्टी ने कानूनी लड़ाई जारी रखने का निर्णय लिया।

फिर अरेावली का मुद्दा उभरा। सरकार ने परिभाषा बदली। कोर्ट ने इसे स्वीकार किया। अब केवल वे पहाड़ियाँ मान्य हैं जो स्थानीय सतह से 100 मीटर ऊपर हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी। वे अनियंत्रित खनन का डर दिखा रहे हैं। कांग्रेस ने इस चिंता को गंभीर माना। इसलिए उसने जनआंदोलन की तैयारी शुरू की।

बैठक ने विदेश मुद्दे पर भी चर्चा की। बांग्लादेश में हिंसा बढ़ी। कुछ हिंदू नागरिक मारे गए। इसने आक्रोश जगाया। कांग्रेस ने शांति और सुरक्षा की मांग रखी। उसने क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया।

अंत में कर्नाटक का सवाल आया। सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच खींचतान जारी रही। समर्थक दिल्ली तक पहुँचे। वे सत्ता में बदलाव की बात करते रहे। हालांकि बैठक ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया। फिर भी बातचीत जारी रही।

इस तरह कार्यसमिति ने कई मोर्चों पर योजना बनाई। एक ओर चुनाव सामने हैं। दूसरी ओर कानून, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे खड़े हैं। इसलिए कांग्रेस अब अपनी politics को आक्रामक मोड में ले जा रही है। वह जनता तक वापस लौटना चाहती है। वह संगठन को सक्रिय बनाना चाहती है। आगे की राह कठिन दिखती है। लेकिन पार्टी ने संकेत दे दिया। वह अब पीछे नहीं हटेगी।


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