एच-1बी वीज़ा में लंबी देरी पर भारत ने उठाई आवाज़, अमेरिका से समाधान की उम्मीद

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अमेरिका में एच-1बी वीज़ा अपॉइंटमेंट लगातार पीछे खिसक रहे हैं। इसी बीच भारत सरकार ने मुद्दा सीधे उठाया और चिंता दर्ज कराई। पृष्ठभूमि साफ है। हजारों भारतीय पेशेवर इंटरव्यू स्लॉट के लिए इंतज़ार बढ़ाते जा रहे हैं। परिवार योजनाएँ टाल रहे हैं। कंपनियाँ प्रोजेक्ट रोक रही हैं। इसलिए सरकार ने हस्तक्षेप किया और संवाद बढ़ाया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने स्थिति समझाई। उन्होंने कहा कि हर देश अपने वीज़ा नियम तय करता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय आवेदक गंभीर देरी झेल रहे हैं। शेड्यूल बदलते रहते हैं। कई लोग महीनों तक फंस जाते हैं। नतीजतन, परिवारों पर आर्थिक और भावनात्मक दबाव बढ़ता है।

इधर, एच-1बी व्यवस्था में बड़े बदलाव आए। नए नियम सीधे चयन और जाँच प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। चूँकि भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा है, इसलिए हर बदलाव का असर सबसे पहले उन्हीं पर पड़ता है। छात्र, इंजीनियर और आईटी प्रोफेशनल अब हर घोषणा पर ध्यान रखते हैं। नियोक्ता योजनाएँ बदलते रहते हैं।

इस महीने अमेरिका ने जाँच और कड़ी कर दी। अब आवेदक और उनके आश्रित अपनी ऑनलाइन उपस्थिति समीक्षा के लिए तैयार रहते हैं। अधिकारी सोशल मीडिया प्रोफाइल सार्वजनिक रखने को कहते हैं। नियम 15 दिसंबर से लागू हुआ। इसके बाद कई इंटरव्यू आगे सरक गए। कुछ स्लॉट मई तक चले गए। परिणामस्वरूप, परिवारों ने फिर से टिकट और तारीखें बदल दीं। नियोक्ताओं ने जॉइनिंग टाल दी।

भारत ने तुरंत संवाद बढ़ाया। अधिकारी वॉशिंगटन और नई दिल्ली में अमेरिकी पक्ष से मिले। उन्होंने देरी के मानवीय प्रभाव पर ज़ोर दिया। उन्होंने अधिक पारदर्शिता और स्थिर शेड्यूल की मांग की। जायसवाल ने कहा कि भारत बातचीत जारी रखेगा और व्यावहारिक समाधान चाहता है।

साथ-साथ अन्य नीतिगत कदम भी असर डाल रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन कुशल पेशेवरों के लिए नियम सख्त कर रहा है। सरकार ऊँचे कौशल को प्राथमिकता दे रही है। साथ ही, पहली बार एच-1बी आवेदन पर भारी शुल्क लागू हुआ। कंपनियाँ लागत आँक रही हैं। युवा पेशेवर विकल्प ढूँढ रहे हैं।

फिर भी, दोनों देशों के लिए सहयोग मायने रखता है। भारतीय विशेषज्ञ अमेरिकी उद्योग को मजबूती देते हैं। अमेरिकी निवेश भारत में नौकरियाँ और नवाचार लाता है। इसलिए सुचारु वीज़ा प्रक्रिया दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद रहती है। संवाद इस संतुलन को बेहतर बना सकता है।

उधर, आवेदक तैयारी जारी रखते हैं। वे दस्तावेज़ अपडेट करते हैं। वे आधिकारिक सूचनाएँ देखते हैं। नियोक्ता बैक-अप प्लान बनाते हैं। परिवार अस्थायी इंतज़ाम ढूँढते हैं। हर कोई तेज़ अपॉइंटमेंट की उम्मीद करता है।

आगे, भारत समाधान पर जोर देगा। सरकार फीडबैक एकत्र करेगी। वह बाधाओं की सूची तैयार करेगी। फिर वह अमेरिका से स्पष्ट समयरेखा माँगेगी। लक्ष्य सरल है—कम देरी, कम रद्दीकरण, अधिक भरोसा।

संक्षेप में, एच-1बी रास्ता अब भी हजारों भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण है। देरी करियर और परिवार दोनों पर बोझ डालती है। लेकिन सतत बातचीत और व्यावहारिक सुधार राहत ला सकते हैं। भारत सक्रिय रूप से मुद्दा उठा रहा है। अमेरिका समायोजन पर विचार कर रहा है। अब दोनों मिलकर प्रक्रिया को सुचारु बना सकते हैं, ताकि प्रतिभा और अवसर के बीच की दूरी कम हो।


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