कनाडा में दो हफ्तों के भीतर दो भारतीय छात्रों की हत्या हुई। खबर ने परिवारों और भारतीय समुदाय को झकझोर दिया। लेकिन पुलिस अलग कहानी रखती है। पुलिस कहती है कि दोनों मामलों में कोई कड़ी नहीं है। फिर भी डर बढ़ रहा है। और लोग सुरक्षा पर जवाब चाहते हैं।
पहला मामला टोरंटो से जुड़ा है। डॉक्टोरल छात्र शिवांक अवस्थी रात में घर लौट रहे थे। तभी हमलावरों ने उन पर गोली चलाई। जगह यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के स्कारबरो कैंपस के पास रही। पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची। अधिकारी ने क्षेत्र घेरा। उन्होंने सबूत जुटाए। उन्होंने कैमरों की फुटेज देखी। इस बीच, संदिग्ध भाग गए। कैंपस में अलर्ट शुरू हुआ। छात्र हॉस्टलों में रहे। फोन लगातार बजते रहे।
फिर पुलिस ने आंकड़े जारी किए। यह इस साल टोरंटो की 41वीं हत्या बनी। साथ ही यह कुछ दिनों में भारतीय समुदाय की दूसरी मौत बनी। भारतीय वाणिज्य दूतावास ने तुरंत संपर्क किया। अधिकारियों ने परिवार को सहायता दी। उन्होंने स्थानीय एजेंसियों से समन्वय किया। उन्होंने एक्स पर दुख जताया। उन्होंने न्याय की मांग दोहराई। दोस्तों ने मोमबत्तियाँ जलाईं। प्रोफेसरों ने यादें साझा कीं। सभी ने तेज जांच की अपील की।
अब दूसरा मामला देखें। टोरंटो में ही हिमांशी खुराना लापता हुईं। उनके दोस्तों ने शिकायत दर्ज की। पुलिस ने खोज शुरू की। अधिकारी ने उनके अंतिम ठिकाने का पता लगाया। फिर उन्होंने एक घर पर तलाशी ली। उन्होंने हिमांशी को मृत पाया। जाँच ने रिश्ते की हिंसा की ओर इशारा किया। पुलिस ने संदिग्ध अब्दुल गफूरी का नाम जारी किया। अधिकारियों ने गिरफ्तारी वारंट निकाला। उन्होंने लोगों से जानकारी माँगी। परिवार सदमे में आ गया। मित्र सहायता के लिए जुट गए।
इस घटना ने एक और बहस खोली। रिश्तों में हिंसा अक्सर चुपचाप बढ़ती है। संगठन पीड़ितों को आवाज देते हैं। वे हेल्पलाइन साझा करते हैं। वे सुरक्षित जगहें बताते हैं। वे सख्त कानून की माँग करते हैं। वे शुरुआती चेतावनियों पर ध्यान देने की अपील करते हैं।
इसी बीच, भारतीय छात्र असुरक्षित महसूस करते हैं। वे नौकरी, पढ़ाई और किराया संभालते हैं। लेकिन अपराध उनकी दिनचर्या तोड़ देता है। इसलिए छात्र संघ बैठकें बुलाते हैं। वे पुलिस अधिकारियों को आमंत्रित करते हैं। वे सुरक्षा टिप्स बाँटते हैं। विश्वविद्यालय अतिरिक्त गश्त की घोषणा करते हैं। वे ट्रेल्स पर रोशनी बढ़ाते हैं। वे काउंसलिंग उपलब्ध कराते हैं।
भारतीय राजनयिक लगातार अपडेट लेते हैं। वे परिवारों से बात करते हैं। वे दस्तावेज़ी प्रक्रिया में मदद करते हैं। वे कानूनी पक्ष समझाते हैं। कनाडाई नेता भी प्रतिक्रिया देते हैं। वे हिंसा की निंदा करते हैं। वे पारदर्शी जाँच पर जोर देते हैं। समुदाय एकजुट होकर खड़ा रहता है।
फिर भी कई सवाल बने रहते हैं। क्या पुलिस तेजी से सच तक पहुँचेगी? क्या कैंपस ज्यादा सुरक्षित बनेंगे? क्या पीड़ित परिवारों को समय पर सहायता मिलेगी? लोग जवाब ढूँढते हैं। और वे बदलाव चाहते हैं।
अंततः, ये दोनों मौतें एक बड़ा संदेश देती हैं। एक गोलीबारी चेतावनी देती है। दूसरी घटना रिश्तों में छिपे खतरे दिखाती है। इसलिए समाज को चौकन्ना रहना चाहिए। परिवारों को समर्थन चाहिए। संस्थाओं को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। और समुदाय को साथ खड़ा रहना चाहिए। जब जाँच आगे बढ़ती है, तब उम्मीद बस यही रहती है—न्याय, रोकथाम और मानवीय सहारा।