ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक: पलमायरा हमले के बाद अमेरिका ने सीरिया में 70 IS ठिकानों पर क्यों की बड़ी कार्रवाई
सीरिया में अमेरिकी सेना ने बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। यह कदम एक घातक हमले के बाद आया। पिछले हफ्ते पलमायरा के पास हुए हमले में दो अमेरिकी सैनिक और एक अमेरिकी नागरिक दुभाषिया मारे गए। इसके बाद वॉशिंगटन ने कड़ा जवाब देने का फैसला किया।
इसी क्रम में शुक्रवार को अमेरिका ने ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक लॉन्च किया। अमेरिकी वायु और जमीनी बलों ने मध्य सीरिया में इस्लामिक स्टेट (IS) के ठिकानों को निशाना बनाया। रक्षा विभाग के अधिकारियों ने कहा कि सेना ने 70 लक्ष्यों पर एक साथ प्रहार किया। इन लक्ष्यों में हथियार डिपो, ठिकाने और लॉजिस्टिक नेटवर्क शामिल रहे। अधिकारियों ने आगे और हमलों के संकेत भी दिए।
इसके साथ ही अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सख्त संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह किसी नई जंग की शुरुआत नहीं है। उन्होंने इसे बदले की स्पष्ट घोषणा बताया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अपने लोगों की रक्षा में कभी हिचकेगा नहीं।
इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई सीरिया में अमेरिकी नागरिकों की “निर्मम हत्या” का जवाब है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका IS के गढ़ों पर जोरदार वार करेगा। उनके अनुसार, अगर IS खत्म होता है तो सीरिया का भविष्य बेहतर हो सकता है।
अब पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। जिन अमेरिकी सैनिकों पर हमला हुआ, वे ऑपरेशन इनहेरेंट रिज़ॉल्व का हिस्सा थे। यह अंतरराष्ट्रीय अभियान 2014 में शुरू हुआ था। इसका लक्ष्य IS को हराना था। उस समय IS ने सीरिया और इराक के बड़े इलाकों पर कब्जा कर लिया था। बाद में गठबंधन ने IS को पीछे धकेला। हालांकि, संगठन ने छिटपुट हमलों और घात लगाकर हमले जारी रखे।
उधर, पलमायरा हमले में हमलावर ने अमेरिकी और सीरियाई बलों के काफिले को निशाना बनाया। सुरक्षा बलों ने बाद में हमलावर को मार गिराया। हमले में तीन अन्य अमेरिकी सैनिक घायल भी हुए। इस घटना ने अमेरिकी सेना की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए।
इसी बीच सीरिया की राजनीतिक तस्वीर भी बदली है। पिछले साल पूर्व विद्रोही गुटों ने बशर अल-असद को सत्ता से हटा दिया। 13 साल के गृहयुद्ध के बाद देश में नई सरकार बनी। इस सरकार में ऐसे गुट भी शामिल हैं, जिन्होंने पहले अल-कायदा से नाता तोड़ा और बाद में IS से लड़ाई की।
इसके चलते अमेरिका और सीरिया के बीच सीमित सहयोग बढ़ा। पिछले महीने सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शारा ने व्हाइट हाउस का दौरा किया। दोनों पक्षों ने IS के खिलाफ सहयोग पर सहमति जताई। सीरिया के गृह मंत्रालय ने हमलावर को सुरक्षा बलों से जुड़ा व्यक्ति बताया, जिस पर IS से सहानुभूति का शक था।
वहीं, सीरिया के विदेश मंत्रालय ने अलग रुख अपनाया। उसने कहा कि देश IS के खिलाफ प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि वह IS को किसी भी तरह का सुरक्षित ठिकाना नहीं बनाने देगा।
हालांकि, अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति बदलती दिखती है। ट्रंप पहले भी सीरिया में अमेरिकी मौजूदगी पर सवाल उठा चुके हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने सैनिकों की वापसी का आदेश दिया था। बाद में अमेरिका ने सीमित बल बनाए रखे।
अब पेंटागन ने सैनिकों की संख्या घटाने की योजना बताई है। अप्रैल में रक्षा विभाग ने कहा कि आने वाले महीनों में बलों की संख्या आधी होगी। जून में अमेरिकी दूत ने संकेत दिया कि भविष्य में सिर्फ एक बेस रहेगा।
फिलहाल अमेरिकी सैनिक उत्तर-पूर्वी सीरिया और जॉर्डन सीमा के पास अल-तनफ में तैनात हैं। लेकिन ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक साफ संदेश देता है। अमेरिका हमले बर्दाश्त नहीं करेगा। जरूरत पड़ी तो वह कड़ा और त्वरित जवाब देगा।
