इसके बाद माहौल और गर्म हो गया। शिवकुमार ने गुरुवार को X पर लिखा कि “वचन निभाना ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है।” उन्होंने कहा कि हर जिम्मेदार व्यक्ति को अपने शब्दों पर खरा उतरना चाहिए। उनके इस संदेश ने 2023 के उस कथित समझौते की चर्चा फिर बढ़ा दी, जिसमें सत्ता साझा करने का दावा हुआ था।
फिर सिद्धारमैया ने भी तुरंत जवाब दिया। उन्होंने लिखा कि “शब्द तभी शक्ति बनते हैं, जब वे जनता का जीवन बेहतर करें।” अपने पोस्ट में उन्होंने पांच साल के जनादेश को स्थायी जिम्मेदारी बताया। यह सीधा हमला माना गया। दोनों नेताओं की इन ऑनलाइन टिप्पणियों ने पार्टी नेतृत्व को और नाराज़ कर दिया।
इसके बाद हाईकमान ने दोनों नेताओं को शांत रहने और एकजुट दिखने का आदेश दिया। इसलिए सिद्धारमैया ने शिवकुमार को शनिवार सुबह नाश्ते पर बुलाया। उन्होंने साफ कहा कि हाईकमान ने बातचीत करने को कहा है, इसलिए वह चर्चा के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि वह पार्टी के निर्णयों का पालन करेंगे और जरूरत पड़ने पर दिल्ली जाएंगे।
शिवकुमार ने भी नरमी दिखाई। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी चीज की जल्दबाज़ी नहीं है। उन्होंने बताया कि कार्यकर्ता उत्सुक हो सकते हैं, पर पार्टी ही अंतिम फैसला करेगी। इस बयान से सत्ता संघर्ष की आग कुछ समय के लिए धीमी पड़ी।
कथित “रोटेशन फॉर्मूला” फिर चर्चा में आया। 2023 में खबरें आई थीं कि दो साल छह महीने बाद मुख्यमंत्री पद शिवकुमार को मिल सकता है। पार्टी ने इसे कभी सार्वजनिक रूप से नहीं माना, पर यह अटकलें दोबारा बढ़ीं जब इस महीने सरकार अपने कार्यकाल के आधे रास्ते तक पहुंच गई। कई नेताओं और सामाजिक समूहों के बयानों ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया।
शिवकुमार से जब इस फॉर्मूले पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने के बजाय “सीक्रेट डील” का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं कर रहे और कुछ बातें सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी मजबूत रहेगी तो नेता भी मजबूत रहेंगे।
इस दौरान, उनके समर्थक छह विधायकों का एक समूह दिल्ली पहुंचा। जब पत्रकारों ने शिवकुमार से पूछा कि क्या उन्होंने उन्हें भेजा है, तो उन्होंने अनभिज्ञता जताई। उन्होंने कहा कि शायद वे मंत्री बनने की कोशिश में हों।
अब सबकी नजर नाश्ते की टेबल पर होने वाली बातचीत पर है, क्योंकि इसी से दिल्ली में होने वाली अगली राजनीतिक हलचल का रास्ता तय होगा।