भागवत ने सभा में कहा कि भारत ने हर संकट का सामना किया। उन्होंने बताया कि यूनान, मिस्र और रोम जैसी सभ्यताएँ इतिहास में मिट गईं। हालांकि भारत डटा रहा। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने अपनी जड़ों से ताकत ली और इसलिए वह आज भी कायम है। उन्होंने भारत को “अमर सभ्यता” कहा जो मानवता को दिशा देती है।
उन्होंने आगे कहा कि हिंदू समाज ने समय के साथ एक मज़बूत सामाजिक व्यवस्था बनाई। इस व्यवस्था ने समुदाय को जोड़े रखा। उन्होंने कहा कि हिंदू जीवनदृष्टि दुनिया को नैतिक आधार देती है। उन्होंने दावा किया कि अगर हिंदू समाज नहीं रहेगा तो दुनिया असंतुलित हो जाएगी।
भागवत ने अपने पुराने रुख को दोहराया कि भारत में कोई भी व्यक्ति मूल रूप से गैर-हिंदू नहीं है। उन्होंने कहा कि मुसलमान और ईसाई भी इसी भूमि के पूर्वजों से जुड़े हैं। इसलिए समाज को विभाजित नहीं होना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे सांस्कृतिक एकता को मजबूत करें और सामूहिक प्रयासों से समाज को स्थिर रखें।
आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर
भाषण के दूसरे हिस्से में उन्होंने अर्थव्यवस्था पर बात की। उन्होंने कहा कि देश को मजबूत बनाना है तो उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह आत्मनिर्भर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ताकत के बिना राष्ट्र खड़ा नहीं हो सकता। ताकत का पहला आधार आर्थिक क्षमता है। उन्होंने कहा कि श्रेष्ठता की भावना गलत हो सकती है, लेकिन आत्मनिर्भरता जरूरी है।
उन्होंने कहा कि देश को किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि सैन्य क्षमता और ज्ञान क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में वही देश टिकता है जिसके पास आर्थिक शक्ति, सैन्य तैयारी और ज्ञान का दायरा होता है। इसलिए भारत को अपने संसाधनों पर विश्वास करना चाहिए और स्थानीय उत्पादन को बढ़ाना चाहिए।
उन्होंने यह टिप्पणी उस समय की जब भारत सरकार विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ‘स्वदेशी’ अभियान पर फिर से जोर दे रही है। अमेरिका ने हाल ही में भारतीय उत्पादों पर ऊँचे शुल्क लगाए हैं, जिससे इस बहस ने फिर जोर पकड़ा है।
भागवत ने कहा कि भारत को चुनौतियों के बीच दिशा तय करनी होगी। उन्होंने कहा कि देश तभी आगे बढ़ेगा जब समाज एकजुट रहेगा और आर्थिक रूप से खड़ा होगा। उन्होंने अंत में कहा कि भारत की सभ्यता दुनिया को रास्ता दिखाती रहेगी, इसलिए उसका मजबूत रहना जरूरी है।