ढाका चुनाव संकट: क्या फरवरी में सचमुच चुनाव होंगे?

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ढाका। बांग्लादेश में फरवरी से पहले आम चुनाव कराने की तैयारी चल रही है। अंतरिम प्रशासन के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने संकेत दिया है कि रमजान से पहले मतदान हो सकता है। यानी चुनाव में अब तीन महीने से भी कम वक्त बचा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये चुनाव एकतरफा होंगे—ठीक वैसे ही जैसे शेख हसीना ने 2024 में कराए थे।

2008 के बाद से बांग्लादेश में कोई निष्पक्ष चुनाव नहीं हुआ। उस चुनाव में अवामी लीग को 48 फीसदी, बीएनपी को 32.5 फीसदी और जमाते इस्लामी को 4.28 फीसदी वोट मिले थे। आज स्थिति अलग है। अंतरिम सरकार ने अवामी लीग की सभी गतिविधियां निलंबित कर दी हैं। चुनाव आयोग ने भी उसे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी। जतीया पार्टी की भागीदारी पर भी सस्पेंस बना हुआ है।

अगर इन दलों को बाहर रखा गया तो 56 फीसदी मतदाता चुनाव प्रक्रिया से बाहर रहेंगे। यूनुस का दावा है कि अवामी लीग का समर्थन 20 फीसदी से ज्यादा नहीं है, पर जमीनी हकीकत अलग कहानी कहती है।

इतिहास बताता है कि अवामी लीग हमेशा मजबूत जड़ों वाला संगठन रहा है। 1975 के बाद भी, जब पार्टी तीन गुटों में बंटी थी, उसे 1979 में 24 फीसदी वोट मिले। 1991 के चुनाव में बीएनपी को 30.81 और अवामी लीग को 30.08 फीसदी वोट मिले थे। दोनों के बीच अंतर मामूली था।

शेख मुजीबुर रहमान की विरासत ने अवामी लीग को एक “परिवार-आधारित” जनाधार दिया है। 2008 में उसे मिले 48 फीसदी वोटों में से लगभग 40 फीसदी ऐसे परिवारों से आए जो पीढ़ियों से अवामी विचारधारा से जुड़े हैं। इस वजह से, पार्टी की पकड़ गांवों और गरीब तबकों में अब भी बनी हुई है।

शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद यूनुस ने इसे “लंबी साजिश का परिणाम” बताया। इस बयान ने अवामी समर्थकों को यकीन दिला दिया कि वे राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि साजिश के तहत हटाए गए।

बीते साल बांग्लादेश की स्थिति बिगड़ी है। कानून व्यवस्था ढीली पड़ी है, महंगाई बढ़ी है, और मध्यम वर्गीय बाजारों से विलासिता की वस्तुएं गायब हैं। आम लोग कह रहे हैं—“हम पहले बेहतर थे।”

बीएनपी और उसके सहयोगी दल अवामी लीग के बिना चुनाव कराना चाहते हैं, पर भीतर से आशंकित हैं। वे जानते हैं कि बिना विपक्ष के चुनाव 1996 या 2024 की तरह एकतरफा रह जाएगा। उस समय भी मतदाता मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंचे थे।

अब यूनुस की अंतरिम सरकार बीएनपी को राजनीतिक जाल में फंसा रही है—जनमत संग्रह, जुलाई चार्टर और अन्य प्रस्तावों के जरिए। नतीजा यह है कि बीएनपी अब लगभग अकेली रह गई है।

हालात इतने अनिश्चित हैं कि खुद सलाहकार महफूज़ आलम ने 25 अक्टूबर को कहा—“अगले कुछ महीनों में स्थिति और बिगड़ेगी।”

ऐसे में सवाल वही बना हुआ है—क्या फरवरी में सचमुच चुनाव होंगे? और अगर हुए भी, तो क्या वे लोकतंत्र को मजबूत करेंगे या फिर बांग्लादेश को एक और राजनीतिक संकट में धकेल देंगे?


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