चुनाव आयोग ने 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची संशोधन का दूसरा चरण शुरू किया, 2003 बना अहम साल

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नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने सोमवार को विशेष व्यापक पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का दूसरा चरण शुरू करने की घोषणा की। यह अभियान 28 अक्टूबर से 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शुरू होगा। इनमें अंडमान-निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ग्यानेश कुमार ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि इस प्रक्रिया में 2003 का साल बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि देशभर में आखिरी बार व्यापक पुनरीक्षण 2003 में हुआ था। इसके बाद छोटे संशोधन तो हुए, पर नागरिकों से नए दस्तावेज नहीं मांगे गए। इसलिए आयोग ने 2003 (या कुछ राज्यों में 2002-04) को आधार वर्ष माना है।

अगर आपका नाम 2002, 2003 या 2004 की पुरानी मतदाता सूची में दर्ज है, तो आपको केवल नामांकन फॉर्म भरना होगा। कोई अतिरिक्त प्रमाण पत्र नहीं देना पड़ेगा।

लेकिन अगर नाम पुरानी सूची में नहीं है, तो प्रक्रिया बिहार जैसी होगी, जहां पहला चरण हाल ही में हुआ। ऐसे मामलों में मतदाता अपने माता-पिता के नाम पुरानी सूची में दिखाकर और पहचान पत्र से रिश्ता साबित करके नाम जुड़वा सकते हैं।

अगर वह भी संभव नहीं है, तो नागरिकों को अपनी पहचान और निवास से जुड़ा दस्तावेज देना होगा। आयोग ने मान्य प्रमाणों की सूची जारी की है, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है। नागरिक अपने राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर पुरानी सूची देख सकते हैं।

अब सवाल उठता है कि 2003 ही क्यों?
ग्यानेश कुमार ने बताया कि यह साल केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नागरिकता के लिहाज से भी अहम है। नागरिकता कानून के अनुसार, जो व्यक्ति 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुआ है, वह भारतीय नागरिक माना जाता है। 2002-04 की सूचियों में दर्ज मतदाता उस समय 18 वर्ष या उससे अधिक के रहे होंगे, यानी वे कानूनन नागरिक हैं। इसलिए आयोग इन सूचियों को विश्वसनीय आधार मान रहा है।

हालांकि, इस प्रक्रिया पर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। बिहार और अन्य राज्यों के विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह कवायद लोगों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश है। उनका कहना है कि आयोग ने शुरू में आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेजों को मान्यता नहीं दी।

वहीं, भाजपा ने इस कदम का समर्थन किया। पार्टी नेताओं ने कहा कि इससे मतदाता सूची अधिक साफ और सटीक बनेगी। उन्होंने इसे पूरे देश में लागू करने की मांग की।

आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया। ग्यानेश कुमार ने कहा, “आयोग केवल यह सुनिश्चित करना चाहता है कि हर योग्य नागरिक का नाम सूची में रहे और कोई अयोग्य नाम शामिल न हो।”

दूसरे चरण की यह कवायद मतदाता सूची को दुरुस्त करने के साथ-साथ नागरिकता और पारदर्शिता के सवालों को फिर से केंद्र में ला रही है। 2003 में शुरू हुई प्रक्रिया अब 2025 में लोकतंत्र की नई कसौटी बन रही है।


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