संघ की शताब्दी यात्रा : संगठन, सेवा और समर्पण का स्वर्णिम इतिहास
✍🏻: गोपी कृष्ण सहाय
नई दिल्ली, 2 अक्टूबर l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा संगठन, सेवा और समर्पण का ऐसा स्वर्णिम इतिहास है, जो न केवल भारत के राष्ट्रीय जीवन की धारा को प्रभावित करता है, बल्कि पूरी दुनिया में यह उदाहरण प्रस्तुत करता है कि संगठित समाज किस प्रकार राष्ट्र को पुनर्जीवित कर सकता है।
इसी संदर्भ में भारत के इतिहास में कुछ ऐसे संगठन हैं, जो केवल अपने अस्तित्व तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे राष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक जीवन में गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) ऐसा ही संगठन है, जिसने 1925 में अपनी स्थापना से लेकर आज तक सौ वर्षों की गौरवमयी यात्रा पूरी की है। यह यात्रा केवल किसी संगठन की प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा, संस्कृति और राष्ट्रनिष्ठा के पुनर्जागरण की गाथा है। सन 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर नागपुर में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उस समय भारत अंग्रेज़ों की गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी कई गहरी समस्याएँ मौजूद थीं—जैसे जातिवाद, अंधविश्वास, ऊँच-नीच की मानसिकता और समाज के बीच खड़ी विभाजन की ऊँची दीवारें।
डॉ. हेडगेवार ने गहराई से अनुभव किया कि यदि भारत को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाना है तो केवल राजनीतिक आंदोलनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज का नैतिक उत्थान, सांस्कृतिक जागरण और चरित्र निर्माण भी उतना ही अनिवार्य है। इसी सोच और दूरदृष्टि के साथ उन्होंने संघ की नींव रखी। उनका मानना था कि एक सशक्त और संगठित समाज ही राष्ट्र की आत्मा को जाग्रत कर सकता है और देश को प्रगति की ओर अग्रसर कर सकता है। इसीलिए संघ ने आरंभ से ही सामाजिक एकता, अनुशासन और राष्ट्रभावना को केंद्र में रखते हुए काम शुरू किया। संघ का मूल मंत्र है – “संघे शक्ति कलियुगे” अर्थात् संगठन में ही शक्ति है। यह संगठन किसी विशेष वर्ग, जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसका ध्येय वाक्य है – “वसुधैव कुटुंबकम्।” संघ का विश्वास है कि भारत केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक सजीव राष्ट्र है जिसकी आत्मा सनातन संस्कृति में निहित है। संघ का कार्य पद्धति में “शाखा” महत्वपूर्ण है। शाखा वह स्थान है जहाँ रोज़ स्वयंसेवक एकत्र होकर शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक शिक्षा प्राप्त करते हैं। यहाँ खेल, व्यायाम, प्रार्थना और संस्कारों के माध्यम से राष्ट्रभक्ति और अनुशासन की भावना जगाई जाती है। संघ की स्थापना के समय ही देश आज़ादी की लड़ाई में जुटा हुआ था। डॉ. हेडगेवार स्वयं कांग्रेस और क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े रहे। संघ के अनेक स्वयंसेवक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन और अनेक स्वतंत्रता संघर्षों में शामिल हुए। यद्यपि संघ ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखी, परंतु इसके स्वयंसेवक स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सहभागी रहे। 1947 में जब देश को आज़ादी मिली तो विभाजन के कारण भयानक दंगे हुए। उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने राहत और पुनर्वास कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शरणार्थियों को बसाने से लेकर भोजन, वस्त्र और सुरक्षा देने तक स्वयंसेवकों ने अपना योगदान दिया। 1950 और 60 के दशकों में जब देश विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा था, तब संघ ने सेवा कार्यों के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन किया। चाहे प्राकृतिक आपदा हो, अकाल हो या युद्धकाल – हर परिस्थिति में स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से देशहित में खड़े रहे। संघ ने समय-समय पर आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों में असाधारण भूमिका निभाई। चाहे 1947 का विभाजन हो, 1962 का चीन आक्रमण हो, 1971 का बांग्लादेश शरणार्थी संकट हो या 2001 का गुजरात भूकंप—हर जगह संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्यों में सबसे आगे रहे। कोविड-19 महामारी के दौरान भोजन, चिकित्सा और रक्तदान जैसे अभियानों में भी संघ ने व्यापक योगदान दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा उसके सरसंघचालकों के अनुकरणीय नेतृत्व और समर्पण का परिणाम है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी अपने अथक परिश्रम और शाखा प्रणाली के माध्यम से संगठन, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की नींव रखी। उनके बाद माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ जी ने संघ की विचारधारा को स्पष्ट दिशा दी और स्वतंत्रता के बाद विभाजन व प्रतिबंध जैसी कठिन परिस्थितियों में संगठन को सुदृढ़ बनाया। बालासाहेब देवरस जी ने समाज को निकट लाते हुए अस्पृश्यता और जातिभेद के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई तथा सेवा कार्यों का व्यापक विस्तार किया। राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ जी ने शिक्षा और संवाद को संघ की प्राथमिकता बनाया, अपने सरल और सहज नेतृत्व से संगठन में नई ऊर्जा भरी। के. एस. सुदर्शन जी ने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, विज्ञान-तकनीक में भारतीय दृष्टिकोण और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष बल दिया। वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी आधुनिक युग की चुनौतियों के अनुरूप संघ को ढालते हुए सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिकरण, ग्राम विकास और पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखकर कार्य कर रहे हैं। इन सभी सरसंघचालकों ने अपने-अपने कालखंड में अलग-अलग प्राथमिकताओं के माध्यम से संघ को दिशा और दृष्टि दी, जिसके परिणामस्वरूप आज संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है। यही संघ की 100 वर्ष की गौरवपूर्ण यात्रा का सार है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में देश को एक नए दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का संकल्प ले चुका है। हाल ही में संघ ने “पंच परिवर्तन” की घोषणा की, ताकि हर गाँव-हर घर तक गुणवत्तापूर्ण जीवन की राह खोली जाए। यह पंच परिवर्तन – सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी आचरण / आत्मनिर्भरता, नागरिक कर्तव्य नि: संदेह राष्ट्र को एक मजबूत दिशा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।
हाल ही में आयोजित “100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज” कार्यक्रम में संघ नेतृत्व ने स्वयंसेवक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कार्यक्रम में कहा कि संघ का मुख्य कार्य मनुष्य निर्माण है। उनका कहना है कि “संघ स्वयं प्रत्यक्ष रूप से काम नहीं करता, बल्कि स्वयंसेवकों को तैयार करता है, और वही समाजहित के विभिन्न कार्यों के लिए निकलते हैं।” यह विचार संघ की उस नीति को दर्शाती है कि संगठन न तो हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करेगा और न ही सत्ता सौंपेगा। कार्यकर्ता स्वयं तय करेंगे कि उनकी क्षमताओं एवं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कहाँ और कैसे सेवा करना है। भागवत जी ने यह स्पष्ट किया कि संघ प्रेरणा और विचार का स्रोत है, लेकिन स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित संगठन स्वतंत्र एवं स्वायत्त रहते हैं। संघ उनमें दबाव नहीं डालता, बल्कि मार्गदर्शन करता है। भागवत ने कहा कि देश की जिम्मेदारी केवल सरकार या राजनीतिक नेतृत्व की नहीं हो सकती। यदि समाज स्वयं संस्कारित, जिम्मेदार और जागरूक होगा, तभी नेतृत्व और सरकार अपने दायित्वों को सही ढंग से निभा पाएँगे। संघ का उद्देश्य है कि समाज स्वयं अपनी दिशा तय करे और नेतृत्व उसी समाज से उत्पन्न हो। यही “समाज निर्माण” की अवधारणा है। सामाजिक क्षेत्र में संघ ने समरसता और एकता की दिशा में कार्य किया। आज हजारों सेवा परियोजनाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में चल रही हैं। आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे सेवा कार्यों ने लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया है। संघ का एक और महत्त्वपूर्ण योगदान संघ परिवार का विस्तार है। संघ से प्रेरित अनेक संगठन शिक्षा, श्रमिक, छात्र, किसान, महिला, कला, साहित्य और उद्योग जगत में कार्य कर रहे हैं। इससे समाज जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है। संघ के अतुलनीय कार्य केवल संगठन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने राष्ट्र निर्माण, समाज सेवा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की धारा को निरंतर प्रवाहित किया है।
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी के व्यक्तित्व और नीतिगत दृष्टिकोण के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। संघ, जो अपने अनुशासन, संगठन-शक्ति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा के लिए प्रसिद्ध रहा है। मोदी जी का जीवन पथ भी उसी संघ की विचारभूमि और संगठनात्मक संस्कृति से आकार ग्रहण करता है, और यही संघ-प्रशिक्षण उन्हें एक साधारण पृष्ठभूमि से उठाकर भारत के सर्वोच्च पद तक लाता है। मोदी जी के किशोरावस्था में ही उनका संपर्क संघ की शाखाओं से हुआ, जहाँ उन्हें कठोर अनुशासन, आत्मसंयम और राष्ट्रहित की भावना का संस्कार मिला। संघ की शाखाएँ केवल शारीरिक व्यायाम का केंद्र नहीं थीं, बल्कि वे वैचारिक प्रशिक्षण और संगठन कौशल विकसित करने का भी माध्यम थीं। यहीं से मोदी जी ने सामूहिकता, समर्पण और सांस्कृतिक चेतना के मूल्य आत्मसात किए। आगे चलकर जब उन्होंने पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में कार्य किया, तो यह अनुभव उनके व्यक्तित्व की नींव बना। संघ ने उन्हें न केवल एक वैचारिक दिशा दी, बल्कि जनसंपर्क, संगठन-निर्माण और संघर्ष की राजनीति का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया।
संघ ने अपने स्वयंसेवकों को राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से भेजने की बजाय उन्हें समाजकार्य, सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़कर एक वैचारिक आधार तैयार किया। नरेन्द्र मोदी जी ने संघ से प्राप्त यही प्रशिक्षण भाजपा में संगठनकर्ता के रूप में अपने कार्यकाल में दिखाया। वे चुनाव-प्रबंधन, कार्यकर्ता-संपर्क और जनसंपर्क में दक्ष बने। संघ का नेटवर्क उनके लिए वह आधार था, जिसने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में और बाद में प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने में निर्णायक योगदान दिया।
मोदी जी के शासन और नीतियों में भी संघ की विचारधारा परिलक्षित होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा के प्रयोग, भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्य-आधारित शिक्षा पर जोर संघ के ही मुद्द्दो से मेल खाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिकल्पना मोदी सरकार की नीतियों में दिखाई देती है—चाहे वह योग और आयुर्वेद को बढ़ावा देना हो, राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना हो, या जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना। इसी प्रकार तीन तलाक पर कानून बनाकर सरकार ने उस सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श को मूर्त रूप दिया, जिसे संघ लंबे समय से उठाता रहा है। आर्थिक दृष्टि से मोदी जी ने उदारवाद और वैश्वीकरण की राह भी अपनाई है—विदेशी निवेश आकर्षित करना, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम इस बात का प्रमाण हैं। लेकिन साथ ही, आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी की भावना भी नीतियों में बार-बार उभरती है, जो संघ के स्वदेशी जागरण मंच के विचारों से सामंजस्य रखती है। नरेन्द्र मोदी जी का नेतृत्व एक ओर संघ के अनुशासन और वैचारिक आधार पर खड़ा है, तो दूसरी ओर उसमें आधुनिक वैश्विक राजनीति का व्यावहारिक दृष्टिकोण भी है। उनकी लोकप्रियता, संगठन क्षमता और नीतिगत निर्णयों में संघ का प्रभाव निर्विवाद है, किंतु उन्होंने उसे समयानुसार बदला और नया स्वरूप भी दिया है। यही कारण है कि मोदी और संघ के रिश्ते को समझना समकालीन भारतीय राजनीति की दिशा और भविष्य को समझने के लिए आवश्यक है।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करोड़ों स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और समर्पण का पर्याय बन चुका है। बीते सौ वर्षों में संघ ने यह सिद्ध कर दिया है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल राजनीतिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि संगठित समाज की चेतना और संस्कृति में निहित होती है। संघ की शाखाओं से तैयार हुए स्वयंसेवक शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हुए समाज के हर वर्ग तक पहुँचे हैं और सेवा को राष्ट्रधर्म के रूप में स्थापित किया है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय से लेकर विभाजन की विभीषिका, प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और महामारी जैसे हर संकट में स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से खड़े रहे। संघ का यह संदेश है कि सेवा और समर्पण ही राष्ट्र को स्थायी आत्मविश्वास और शक्ति प्रदान करते हैं। शताब्दी वर्ष पर यह यात्रा हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्र निर्माण का मूल आधार संगठित समाज है। यही संगठन समाज को संस्कारित करता है, कर्तव्यनिष्ठ नागरिक तैयार करता है और राष्ट्र को भविष्य की ऊँचाइयों तक ले जाता है। इसीलिए संघ की शताब्दी यात्रा केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दिशा, प्रेरणा और स्वर्णिम भविष्य का संकल्प है।
✍🏻: गोपी कृष्ण सहाय
