बॉलीवुड के अनकहे किस्से : पालकी का दुर्भाग्य

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अजय कुमार शर्मा

संगीतकार नौशाद ने फिल्म पालकी की कहानी जो कि लखनऊ की एक सच्ची घटना पर आधारित थी जब अपने समय के लोकप्रिय निर्देशक एस.यू. सन्नी साहब को सुनाई तो वे उस पर तुरंत ही फिल्म बनाने को तैयार हो गए। मुंबई के एक बहुत बड़े व्यापारी पूनम भाई शाह ने उस पर पैसा लगाने की हामी भर दी हालांकि निर्माता के रूप में उनका यह पहला प्रयास था। इसके लिए एक नई फिल्म कंपनी पूनम पिक्चर्स बनाई गई। हीरो के लिए राजेंद्र कुमार और वहीदा रहमान को हीरोइन चुना गया। रहमान और जानी वाकर ने भी अहम रोल अदा किए थे। फिल्म की आउटडोर शूटिंग लखनऊ में ही कई स्थानों पर करने की योजना बनाई गई थी। पहली शूटिंग लखनऊ के पास में ही देवा शरीफ (वारिस अली शाह की दरगाह) में रखी गई, लेकिन भीड़ ने शूटिंग के दौरान बहुत परेशान किया तो सन्नी साहब ने अपने असिस्टेंट मिर्ज़ा मसूद बेग को राजेंद्र कुमार का डुप्लीकेट बनाया और काली शेरवानी और पजामे में लखनऊ रेलवे स्टेशन तथा गालियों, बाजारों में उनके कई लॉन्ग शॉट लिए। राजेंद्र कुमार के साथ बाकी शॉट स्टूडियो में सेट लगाकर पूरे किए गए। वहीदा रहमान पर फिल्माए जाने वाले गाने “जाने वाले तेरा खुदा हाफिज” की शूटिंग में भी यही समस्या होने पर राजेंद्र कुमार और वहीदा रहमान दोनों ने वहां काम करने से इनकार कर दिया।

बात यहीं पर खत्म नहीं हुई, देवा शरीफ़ पर फिल्माई जाने वाली कव्वाली और कैसरबाग में फिल्माया जाने वाला मुशायरा भी भीड़ द्वारा रहमान को परेशान किए जाने के कारण नहीं फिल्माए जा सके। थक हार के सन्नी साहब ने इन सारी जगहों के कई फोटो लिए और मुंबई के स्टूडियो में सेट लगवाकर शूटिंग की। इसी मुशायरे की शूटिंग के दौरान अचानक सन्नी साहब का देहांत हो गया। फिल्म के दूसरे डायरेक्टर के रूप में महेश कौल को बुलाया गया, लेकिन इसी मुशायरे की शूटिंग के दौरान महेश कौल भी सख्त बीमार हो गए और शूटिंग बीच में ही रोक दी गई। बाद में यह जिम्मेदारी के. आसिफ साहब को सौंपी गई। इसी सेट पर कव्वाली “मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं” की भी शूटिंग की गई थी।

इस तरह से फिल्म पालकी तीन अलग-अलग निर्देशकों के निर्देशन में बनी। इसके चलते कहानी में बहुत बदलाव हो गए। फिल्म पूरी कराने में नौशाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी जो की फिल्म के संगीतकार भी थे। बार-बार फिल्म बंद होने पर निर्माता पूनम भाई शाह एक बार नौशाद के घर गए और उनसे फिल्म पूरी करवाने का अनुरोध किया। क्योंकि यह उनकी पहली फिल्म थी और वे फिल्म में अब तक तीस लाख रुपये खर्च कर चुके थे। किसी ने उन्हें यह कहकर भी डरा दिया था कि फिल्म लाइन में आप नए हैं और यह फिल्म वाले लोग किसी भी नए आदमी को बलि का बकरा बना ही देते हैं। नौशाद साहब ने उन्हें फिल्म पूरी करवाने का आश्वासन दिया। उन्होंने अगले ही दिन फिल्म की पूरी यूनिट को अपने घर बुलाया और सब से बात की। वजाहत मिर्जा साहब (संवाद लेखक) और कैमरामैन फरीदू ईरानी ने फिल्म को पूरा करने में हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन दिया। 1967 में जब फिल्म पूरी होकर मुंबई में रिलीज़ की जानी थी तो सन्नी साहब की पत्नी ने पूनम भाई पर पैसे देने के लिए मुकदमा दायर कर दिया, जबकि पूनम शाह उनके बेटों को साठ हजार रुपये दे चुके थे, लेकिन नौशाद साहब के कहने पर उन्होंने सन्नी साहब की पत्नी को भी साठ हजार रुपये दिए।

चलते चलतेः फिल्म में एक मुश्किल और आई थी। सन्नी साहब की सहमति से राजेंद्र कुमार पर फिल्माए जाने वाले गीत “कल रात जिंदगी से मुलाकात हो गई” को तलत महमूद साहब की आवाज में रिकॉर्ड कर लिया गया था, लेकिन फिर उसे मोहम्मद रफी साहब की आवाज में गवाए जाने के लिए कहा गया। नौशाद साहब इस बात के लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि तलत साहब क्या कहेंगे? और उधर मोहम्मद रफी साहब भी मना कर रहे थे कि तलत साहब मेरे सीनियर हैं। निर्माता पूनम भाई ने मोहम्मद रफी को तैयार करने की जिम्मेदारी के.आसिफ को दी। आखिर आसिफ साहब ने मोहम्मद रफ़ी साहब को गाना गवाने के लिए मना ही लिया, लेकिन इसके चलते तलत और नौशाद के बीच में गलतफहमी की दीवार खड़ी हो गई, जो नौशाद साहब के लाख समझाने पर भी दूर नहीं हुई।

(लेखक- राष्ट्रीय साहित्य संस्थान के सहायक संपादक हैं। नब्बे के दशक में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए ख्यातिलब्ध रही प्रतिष्ठित पहली हिंदी वीडियो पत्रिका कालचक्र से संबद्ध रहे हैं। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं।)


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