चीन को सटीक जवाब देने के लिए भारत भी बनाएगा अपनी ‘रॉकेट फोर्स’

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पीएलए के मुकाबले के लिए भारत के पास है मजबूत क्षमता और सैन्य संतुलन

 चीनी ‘रॉकेट फोर्स’ को मुंहतोड़ जवाब देने को एलएसी पर स्पेशल फोर्सेज तैनात



नई दिल्ली, 09 नवम्बर (हि.स.)। चीन को सटीक जवाब देने के लिए भारत भी अब अपनी ‘रॉकेट फोर्स’ बनाएगा। एकीकृत रॉकेट फोर्स बनाने की इस योजना से स्पष्ट संकेत है कि भारत संयुक्त बल के माहौल में ‘गैर-संपर्क’ युद्ध के युग को पूरे दिल से स्वीकार कर रहा है। भारत की यह घोषणा कई मायनों में चीन के मुकाबले के लिए सैन्य संतुलन बिठाने के मद्देनजर की गई है, क्योंकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की रॉकेट फोर्स के पास भारतीय सैन्य लक्ष्यों के खिलाफ पारंपरिक मिसाइल हमला अभियान चलाने की क्षमता है।

सीमा पर तनाव कम करने के लिए चल रहे सैन्य और कूटनीतिक प्रयासों के बीच चीन ने एलएसी के पास बड़ी संख्या में ‘रॉकेट फोर्स’ तैनात की है। चीन को पहले से ही अपनी रॉकेट फोर्स पर सबसे ज्यादा भरोसा रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने यह रॉकेट फोर्स 2016 में अलग से बनाई थी, क्योंकि चीन के पास दुनिया में सबसे बड़ा रॉकेट का भंडार है। चीन के पास जमीन से हवा में मार करने वाली एचक्यू-9 और एचक्यू-16 मिसाइलें हैं। चीन की ‘रॉकेट फोर्स’ को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारत ने बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाने वाली स्पेशल फोर्सेज को लद्दाख सीमा पर तैनात कर रखा है। देश के अलग-अलग स्थानों से पैरा स्पेशल फोर्स की यूनिट को लद्दाख में ले जाया गया है।

इसके विपरीत भारत के पास दुनिया की बेहतरीन मिसाइलों का भंडार है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत ने भी दो माह पहले कहा था कि भारत अपनी खुद की एक ‘रॉकेट फोर्स’ बनाना चाहता है। भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मई 2020 की गर्मियों से चल रहे लंबे गतिरोध ने ‘रॉकेट फोर्स’ बनाने के लिए भारत के इरादे को काफी हद तक मजबूत किया है। हालांकि इसका इस्तेमाल केवल सतह से सतह पर मार करने के लिए नहीं बल्कि दुश्मन के केंद्रों जैसे कमांड और कंट्रोल पोस्ट, एयर डिफेंस सेंसर, स्टेजिंग क्षेत्रों और लॉजिस्टिक्स नोड्स ग्राउंड, लॉन्च किए गए वैक्टर को इंटरसेप्ट करने के लिए किये जाने की योजना है।

आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच वास्तविक हालिया संघर्षों के बारे में बात करते हुए सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे कह चुके हैं कि सीमा के अग्रिम इलाकों में तैनाती के दौरान जब सैनिक हाई अलर्ट की स्थिति में होते हैं तो वही सटीक लक्ष्य के साथ पहली हिट लेते हैं। वह वायु रक्षा कवर को तोड़ते हैं या तोपखाने की तोपों, मिसाइलों के ठिकानों और टैंक को लक्षित करते हैं। दूर से रॉकेट और मिसाइल हमले को नरम करने के लिए लड़ाई में शामिल होते हैं। वास्तव में भारतीय सेना भविष्य के संघर्ष में जल्द ही हवाई समर्थन पर भरोसा करने में सक्षम नहीं हो सकती है। इसके बजाय भारतीय सेना की अपने लंबी दूरी के सटीक वैक्टर की आक्रामक और रक्षात्मक वायु संचालन दोनों को सक्षम करने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

एकीकृत रॉकेट फोर्स बनाने की इस योजना से स्पष्ट संकेत है कि भारत सीमित युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर सतह से सतह मिसाइल (एसएसएम) का उपयोग करेगा। इसीलिए भारत ने अपने मिसाइल विकास और उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र की बदौलत रॉकेट फोर्स गठित करने की परिकल्पना की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के अध्यक्ष जी. सतीश रेड्डी ने भी हाल ही में कहा कि भारत के पास मिसाइल प्रौद्योगिकी में ‘पूर्ण आत्मनिर्भरता’ है। उनका यह बयान निश्चित रूप से बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए सही है, जिसमें ठोस-ईंधन रॉकेट मोटर्स और जड़त्वीय नेविगेशन सिस्टम (आईएनएस) से लेकर सिस्टम-ऑन-चिप-आधारित ऑन-बोर्ड कंप्यूटर और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं से उपलब्ध होने वाले एक्ट्यूएटर तक सब कुछ है।


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