पीएमओ की निगरानी में मैसूर के मूर्तिकार ने तराशी थी आदि शंकर की मूर्ति

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बेंगलुरु, 06 नवंबर (हि.स.): प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोवर्धन पूजा के दिन केदारनाथ धाम परिसर में आदि शंकराचार्य की ध्यानावस्था में 12 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया। आसन सहित इस मूर्ति का कुल वजन 35 टन है। इसे मैसूर के 37 वर्षीय अरुण योगीराज के नेतृत्व में मूर्तिकारों की एक टीम ने तराशा है।

यहां यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि उत्तराखंड में साल 2013 में आई भीषण आपदा के बाद हो रहे पुनर्निर्माण के कार्य की निगरानी प्रधानमंत्री कार्यालय कर रहा है। केन्द्र सरकार ही आदि शंकराचार्य की मूर्ति के पुनर्स्थापना की परियोजना बनाई और उसके लिए कई मूर्तिकारों को आमंत्रित किया था। कुल मिलाकर 18 प्रारूप और प्रस्ताव प्राप्त हुए। जिस प्रतिमा का शुक्रवार को गोवर्धन पूजा के दिन अनावरण हुआ, अरुण योगीराज के उस प्रारूप को प्रधानमंत्री कार्यालय ने ही मंजूरी दी थी।

इस प्रतिमा को तराशने का काम पिछले साल सितंबर में शुरू हुआ था और अरुण योगीराज ने सात अन्य लोगों की एक टीम के साथ स्वयं काम किया था। सही समय पर और दिए गए प्रारूप के अनुसार ही मूर्ति का निर्माण हो, इसके लिए पूरी टीम ने दिन-रात पूरी लगन से काम किया। इतनी ऊंची और वजनी मूर्ति को वहां तक पहुंचाना भी आसान काम नहीं था। इसलिए सेना के हेलीकॉप्टर पर लादकर सीधे मैसूर से इसे उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम पहुंचाया गया।

120 टन की विशिष्ट शिला:

मंदिरों में पूजा करने के लिए देवी-देवताओं की मूर्तियों को सामान्य रूप से कृष्ण शिला या गहरे या चटख काले रंग की चट्टान में से उकेरा जाता है। केदारनाथ धाम की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आदि शंकराचार्य की मूर्ति के लिए 120 टन के क्लोराइट शिस्ट स्टोन का चयन किया गया। इससे निर्मित संरचना बारिश, धूप और प्रतिकूल जलवायु वाली परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती है।

पांचवीं पीढ़ी के मूर्तिकार:

मूर्तिकार अरुण का पत्थरों से संबंध जन्मजात है। वे अपने परिवार में मूर्तिकला के मामले में पांचवीं पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं। चौडप्पा आचार, बसवन्ना आचार, बसवन्ना शिल्पी, योगीराज शिल्पी कर्नाटक के लोकप्रिय कलाकार थे। अरुण अपने बचपन से ही दादा और पिता द्वारा पत्थरों की खुदाई वाले यंत्र की तरफ आकर्षित रहते थे। जब उनके साथी बच्चे खेलने जाते तो अरुण उस समय पत्थरों के बीच रहना पसंद करते थे। जिस उम्र में बच्चे गेंद से खेलना पसंद करते थे, उस उम्र में वह पत्थरों के तराशने वाले नुकीले यंत्रों से खेलकर कई बार चोटिल हो जाते थे परन्तु इससे उनका हौंसला कभी कम नहीं हुआ। उनके दादा और पिता हमेशा उन पर नजर रखते और उनका हौंसला बढ़ाते रहते थे।

अरुण बताते हैं, “मेरे पिता और दादा हर पत्थर को ज़िंदा रखना चाहते थे। किसी भी शिला पर उनके द्वारा की गई हर चोट (स्ट्रोक) ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उन्होंने मुझमें से भी एक सुंदर मूर्ति को उकेरा, एक प्रकार से मेरा घर ही मेरा पहला स्कूल बन गया।’’

मूर्ति का अनावरण हो जाने के बाद कर्नाटक के मैसूर जिले के प्रभारी मंत्री एसटी सोमशेखर ने मूर्ति के मुख्य वास्तुकार अरुण योगीराज को सम्मानित किया। कार्य को पूरा करने वाली पूरी टीम के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर था।


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