भारतीय सभ्यता की पहचान और अभिव्यक्ति के जीवंत रूप हैं स्वामी विवेकानंद : राकेश सिन्हा

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बेगूसराय, 11 सितम्बर (हि.स.)।शिकागो के धर्म संसद (विश्व धर्म महासभा) में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए संबोधन के वर्षगांठ पर शनिवार को उन्हें श्रद्धापूर्वक  याद किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद के कृतित्व पर चर्चा कर रहे  राज्यसभा सदस्य प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा है कि समाज सुधार करने वाले आलोचनाओं से नहीं डरते हैं, ना ही संतुलन बनाना उनका उद्देश्य होता है। जो ऐसा करते हैं वे सुधार के खोखले प्रवक्ता बनकर आते और चले जाते हैं।

राकेश सिन्हा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने झोपड़ी और झंकार दोनों के महत्व को समझा था कि संस्कृति और समानता दोनों सहचर होते हैं। स्वामी विवेकानंद जीवंत रूप में हमारी सभ्यता की पहचान और अभिव्यक्ति दोनों हैं। साधना सामान्य नहीं होता है, साधना का जय जयकार जरूर आसान होता है। स्वामी विवेकानंद शिकागो पहुंचे और फिर इन्हें विशेष धर्म संसद में बोलने का अवसर मिला। यह अपने आप में एक प्रकृति की योजना थी, सब अनियोजित था पर निष्कंटक होता गया।

भाजपा सांसद ने कहा कि धर्म संसद में उन्होंने भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति किया कि भ्रातृत्व की अवहेलना कर कोई धर्म हो ही नहीं सकता है। पश्चिम के असामान्य लोग एकरूपतवादी धर्म की व्याख्या और चर्च के आध्यात्मिक अधिनायकवाद से त्रस्त थे। मानव का स्वभाव स्वतंत्रता और समानता का होता है, तभी तो एक धनवान का बच्चा कुटिया में रहनेवाले मिट्टी में खेल रहे बच्चे आकर्षित होता है और साथ खेलना चाहता है। असमानता का प्रशिक्षण हम देते हैं, स्वतंत्र चेतना को हम स्वम बंधक रखते हैं। स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिक बहुलता को स्वाभाविक मानकर कहा कि हम सब भाई-बहन हैं। पश्चिम के एकरूपतावादी और विखंडनवादी पिंजरे में बंद लोगों के लिए यह अमृत की तरह था। जिस स्वामी विवेकानंद जी ने पश्चिम में हजारों डालर अपने भाषणों के द्वारा अर्जित कर भारत के गरीबों के लिए भेजा, उन्हीं स्वामी की मां के पास रहने के लिए घर नहीं था। जिस घर में वो रहती थी, उसमे बरसात का पानी, गर्मी, तेज धूप और जाड़े की कपकपीं पैदा करने वाली ठंढी हवा का सुगम प्रवेश था। मृत्यु को करीब देखकर स्वामी विवेकानंद ने अपने मित्र खत्री के राजा अजीत सिंह को पत्र लिखकर अपनी मां के लिए एक रहने लायक घर बनवा देने और एक सौ रुपया प्रति माह भेजने की विनती करनी पड़ी थी। स्वामी विवेकानंद जी का जय-जयकार तो सामान्य और स्वाभाविक है। लेकिन यह समाज के लिए आत्मालोचन का एक अवसर है।

उन्होंने कहा कि महापुरुष जिस मूल्य पर जीते हैं, उसकी रक्षा के लिए हम क्या कर रहे हैं। मेमोरियल बनवाना, मूर्ति स्थापित करना, महिमामंडित करना एक पक्ष है और बहुत हद तक आवश्यक है। लेकिन उनके विचारों के समग्र भाव को ग्रहण करना उससे लाख गुना आवश्यक है। अंत में सब चीज कर्मकांड बनकर रह जाता है जो भारत की अनेक विकृत प्रवृत्तियों में एक है। स्वामी विवेकानंद ने सामंती व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया था, जिसके कारण शिकागो से लौटने के बाद लाल मुरेठा बांधे जमींदारों-धनवानों में कुछ हद तक आलोकप्रिय हो गए थे, लेकिन इन्हें इस बात की किंचित चिंता नहीं थी।


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