जितने अच्छे खिलाड़ी, उससे अच्छे समाजसेवी हैं धोनी

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नई दिल्ली, 21 अगस्त (हि.स.)। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और भारत के सबसे सफल एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कप्तान रह चुके महेंद्र सिंह धोनी आक्रामक बल्लेबाज़ भले ही रहे हों, लेकिन जितने अच्छे खिलाड़ी वे हैं, उससे कहीं अच्छे समाजसेवी भी हैं।

भारत सुंदरेशन द्वारा लिखित एवं हिन्द पॉकेट बुक्स, पेंगुइन रेंडम हाउस द्वारा प्रकाशित पुस्तक महेंद्र सिंह धोनी : एक अबूझ पहेली में इस बात का खुलासा हुआ है। गरीब, असहाय लोगों की मदद तो वे खुलकर करते हैं कि अपने बचपन के दोस्तों को भी महंगी गाड़ियां तक उपहार में दे देते हैं। इसी के साथ इस पुस्तक में एक और खुलासा हुआ कि महेंद्र सिंह धोनी शराब एवं धूम्रपान पसंद नहीं करते। मज़ेदार, स्पष्ट और रोचक प्रसंगों से भरपूर इस पुस्तक से एक साधारण व्यक्ति के असाधारण जीवन का खुलासा होता है।

पुस्तक के अनुसार, धोनी को शराब पसंद नहीं है। वह इसके प्रति अपना विरोध भी मुखरता से करते हैं। उनके कुछ करीबी कहते हैं कि उसकी गंध उन्हें परेशान करती है, विशेष रूप से शैंपेन और बीयर की। इस हद तक कि अगर अपने कमरे को उन्हें उसका हलका-सा झोंका भी महसूस हो तो वह उसे बदल लेते हैं। अगर वह टीम को ड्रेसिंग रूम में चारों तरफ शैंपेन उड़लते जीत का जश्न मनाते देखते हैं, तो वहां नहीं जाते जैसे टीम 2006 में जोहान्सबर्ग टेस्ट जीत के बाद शैंपेन की बोतल खोल जश्न मना रही थी, जब भारतीय टीम थोड़ी उत्तेजित हो गई थी। आखिरकार, यह दक्षिण अफ्रीका में उनकी पहली टेस्ट जीत थी।

यह धोनी के कैरियर का चौदहवां टेस्ट मैच था, लेकिन उन्होंने बुलरिंग में ड्रेसिंग रूम के ठीक बाहर घास वाले किनारे पर इंतजार करना पसंद किया और वहां से हिले तक नहीं, क्योंकि उनके कुछ साथी तेजी से भागते हुए और एक दूसरे को बीयर और संतरे के रस से भिगोते हुए इधर-उधर भाग रहे थे। यहां तक कि इस उग्र तरह से मनाए जा रहे उत्सव ने तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल को ‘‘एक-दूसरे पर बीयर उड़लने के बजाय उसे पीने’’ पर काफी देर तक बोलने के लिए उकसा दिया था। धोनी अकसर खुद कहते हैं कि यह शराब का ‘‘कड़वा’’ स्वाद है, जो उन्हें इसे पीने से रोकता है।

पुस्तक के अनुसार, धोनी को सिगरेट पीना भी पसंद नहीं है लेकिन अपने युवा दिनों में वह अपने विदेशी दौरों के दौरान ड्यूटी-फ्री दुकानों से अकसर अपने करीबी दोस्तों के लिए सिगरेट खरीदा करते थे। हालांकि, बिना ताना मारे वह उन्हें सिगरेट नहीं देते थे- ‘मेरे पैसे से तू खुद की जिंदगी जला रहा है।’

पुस्तक खुलासा करती है कि धोनी सामाजिक बुराइयों का खात्मा करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। वास्तव में भारत के सबसे स्टाइलिश, जिज्ञासु एवं अपनी लड़ाकू शैली को नियंत्रण करने की समझदारी रखने वाले एक आक्रामक बल्लेबाज की एक प्रेरक कहानी इस पुस्तक में दी गई है।


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