दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में आयोजित स्वच्छता पखवाड़ा के अंतर्गत “स्वच्छता की भारत में प्राचीन परम्परा” विषय पर वेबिनार द्वारा संगोष्ठी

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नई दिल्ली, 22 अप्रैल: संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशानुसार दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा दिनांक 16 से 30 अप्रैल 2021 तक “विश्व विरासत दिवस” के उपलक्ष्य में स्वच्छता पखवाड़ा के रूप में मनाया जा रहा है। इसी के अंतर्गत दिनांक 22 अप्रैल 2021 को “स्वच्छता की भारत में प्राचीन परम्परा” विषय पर वेबिनार द्वारा संगोष्ठी आयोजित की गई। यह कार्यक्रम दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. रामशरण गौड़ की अध्यक्षता में आयोजित किया गया जिसमें वक्ता के रूप में सांस्कृतिक गौरव संस्थान के संस्थापक एवं सदस्य डॉ. महेश चंद गुप्त उपस्थित रहे। कार्यक्रम में दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री महेश चन्द्र शर्मा एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनोद बब्बर विशेष रूप से उपस्थित रहे। सुश्री नीरू द्वारा सरस्वती वंदना से वेबिनार का शुभारम्भ किया गया।

डॉ. महेश चंद गुप्त ने श्रोताओं को बताया कि स्वच्छता भारतीय संस्कृति में मूल रूप से चली आ रही है। जूते घर के बाहर ही उतारना, प्रभात में स्नान आदि के पश्चात ही रसोई में प्रवेश करना, प्रतिदिन धुले कपड़े पहनना, घर में साफ-सफाई रखना, हाथ धोने के बाद ही भोजन करना हमारी प्राचीन संस्कृति रही है।प्राचीन काल में हर व्यक्ति सफाई के प्रति सजग था। फलों और सब्जियों का धोकर ही प्रयोग करना, खांसते या छींकते समय रुमाल अथवा कपड़े का उपयोग करना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। यह अलग बात है कि यह सब बातें जो हम भूल गए थे उसे हमें इस महामारी ने पुनः स्मरण करवा दिया है। उन्होंने सभी श्रोताओं से कहा कि हम भारतीयों को यह सब सीखने की जरुरत नहीं हैं, जरुरत है तो सिर्फ उन्हें पुनः अपनाने की।

श्री महेश चंद्र शर्मा ने स्वच्छता पर वेबिनार आयोजित करने हेतु तथा डॉ. महेश चंद गुप्त द्वारा ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणात्मक वक्तव्य प्रस्तुत करने हेतु अभिवादन किया। साथ ही, सभी श्रोताओं से दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी से जुड़ने तथा इसकी सेवाओं का उपयोग करने का आह्वान किया।

डॉ. विनोद बब्बर ने श्रोताओं को बताया कि भारत में प्राचीन काल से ही अस्वच्छ व्यक्ति और वातावरण से दूरी रखने, बीमारों को एकांत में रखने, घर में जूठे बर्तनों को न छोड़ने, घर में साफ-सफाई रखने, प्रतिदिन स्नान करने के बाद ही भोजन पकाने व खाने की परंपरा रही है। हमें आज के इस आधुनिक युग में पुनः अपनी संस्कृति को जीवंत करने की आवश्यकता है।

अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।

 


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