सबसे लंबी पारी त्रिवेंद्र की फिर भी नहीं हो सका कार्यकाल पूरा

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मोदी और शाह की गुड बुक में, फिर भी छिन गई कुर्सी



देहरादून, 09 मार्च (हि.स.)। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भाजपा की अंदरुनी गुटबाजी का शिकार हो गए। बावजूद इसके उन्होंने  इस पद पर सबसे लंबी पारी खेली। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद की भाजपा की अंतरिम सरकार हो या फिर इसके बाद की निर्वाचित सरकार, किसी में भी कोई त्रिवेंद्र सिंह रावत की तरह करीब चार साल तक सीएम नहीं रह पाया। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की गुड बुक में शामिल होने के बावजूद वह  पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। उत्तराखंड में सीएम बतौर पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की उपलब्धि कांग्रेस के दिग्गज दिवंगत नेता एनडी तिवारी के नाम पर दर्ज है।
प्रचंड बहुमत की सरकार को जिस तरह से त्रिवेंद्र सिंह रावत चला रहे थे और जिस तरह का उनके प्रति मोदी-शाह का भरोसा था, उसमें यह माना जा रहा था कि वह पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब चमोली आपदा के दौरान बेहतर प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार ने उनकी पीठ थपथपाई थी। गैरसैंण को तीसरी कमिश्नरी घोषित करने के साहसिक फैसले से यही संदेश गया था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत चुनावी वर्ष में खुलकर बल्लेबाजी करने के मूड में हैं।
सख्त मिजाज त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रति असंतोष की खबरें नई नहीं हैं, बल्कि बहुत पहले से इसके संकेत उभर रहे थे। मगर आगामी विधानसभा चुनाव के दबाव में हाईकमान ने जिस तरह से असंतोष पर गंभीरता दिखाई, वह सभी को चौंकाने वाला रहा है। माना जा रहा था कि भाजपा हाईकमान  इस बार यही मन बनाकर बैठा है कि हर सरकार में सीएम बदलने की जो स्थिति आज से पहले बनी है, वह इस बार नहीं बनेगी। मगर भाजपा हाईकमान इस नियति से पार नहीं पा सका।
2017 में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद 18 मार्च को त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सीएम पद संभाला था। इस हिसाब से देखें, तो चार साल में नौ दिन पहले ही वह पद से हट गए। इसके बावजूद उनका कार्यकाल बीजेपी के किसी भी अन्य सीएम के मुकाबले कहीं ज्यादा रहा। राज्य बनने के बाद नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी का कार्यकाल सिर्फ महीनों में गिना गया था। इसके बाद 2007 में निर्वाचित सरकार के सीएम बने भुवन चंद्र खंडूरी बमुश्किल ढाई साल ही काम कर पाए। इसके बाद उनकी जगह डाॅ. रमेश पोखरियाल को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया गया। हालांकि 2011 में एक बार फिर खंडूरी की ताजपोशी हुुई, लेकिन यह सिर्फ तीन महीने की ताजपोशी थी। इसके बाद, भाजपा पांच साल तक सत्ता से बाहर ही रही। 2017 में सरकार आने पर त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सीएम की कुर्सी संभाली और प्रचंड बहुमत की सरकार को पूरी दमदारी से चलाया।
सीएम आवास का मिथक और पुख्ता हुआ
न्यू कैंट रोड में बने विशाल और भव्य सीएम आवास का मिथक त्रिवेंद्र सिंह रावत की इस पद से विदाई के बाद और पुख्ता हो गया है। दरअसल इस भवन के साथ यह मिथक जुड़ा है कि इसमें निवास करने वाला सीएम अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता। भुवन चंद्र खंडूरी, डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा और अब त्रिवेंद्र सिंह रावत का इस क्रम में जिक्र हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में सीएम बनने के बाद हरीश रावत ने बीजापुर गेस्ट हाउस में ही रहना पसंद किया और वह इस सीएम आवास नहीं गए। सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जब पदभार संभाला, तो उन्हें भी इस मिथक की जानकारी दी गई थी, लेकिन किसी अंधविश्वास में पड़ने से उन्होंने मना कर दिया था। उन्होंने इसे ही अपना आवास बनाया।

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