कुंभ के शाही स्नान से ‘इसलिए’ दूर रहते हैं वीवीआईपी

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आजादी के बाद 1954 में प्रयागराज के पहले कुंभ में मची भगदड़ में 1000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। पुलिस और प्रशासन वीवीआईपी की सुरक्षा में सुरक्षा मशगूल रहा था।



हरिद्वार, 03 जनवरी (हि.स.)। हरिद्वार कुंभ में देश-दुनिया के लोग डुबकी लगाने को आतुर हैं। इंतजार है तो बस सरकार की अधिसूचना जारी करने का। मगर एक प्रश्न हर कुंभ में लोगों को जेहन में जरूर कौंधता है कि कुंभ के शाही स्नान में आखिर वीवीआईपी और वीआईपी क्यों नहीं हिस्सा लेते।  आखिर क्यों शाही स्नान के समय इनका कुंभ मेले में प्रवेश प्रतिबंधित है। इसका कोई पौराणिक आधार नहीं है। इसके पीछे  भयावह त्रासदी की परछाइयां हैं। वह 1954 से अब तक कुंभ के शाही स्नान का पीछा कर रही हैं।
कुंभ मेले के शाही स्नान में साधु-संत और देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य के भागीदार बनते हैं। मगर 1954 के बाद से अब तक के किसी भी कुंभ के शाही स्नान में वीवीआईपी और वीआईपी आस्था की डुबकी नहीं लगा सके हैं।
उदासीन बड़े अखाड़े के मुख्य महंत और कुंभ मेला प्रभारी दुर्गादास कहते हैं कि देश आजाद होने के बाद पहला कुंभ प्रयागराज में हुआ था। मौनी अमावस्या थी। लाखों श्रद्धालु संगम तट पर थे। शाही स्नान के लिए सभी अखाड़ों के संत अपने समयानुसार संगम की तरफ जा रहे थे। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू नाव से संगम जा रहे थे। भीड़ नेहरू को देखने के लिए बेकाबू हो गई। इस दौरान भगदड़ मच गई। कहा जाता है कि इस भगदड़ में करीब 1000 से ज्यादा लोग मर गए।
दुर्गादास का कहना है कि प्रशासन ने आरोप लगाया कि अखाड़ों के शाही स्नान में भगदड़ मची।  सच यह है कि नेहरू के आने की वजह से भगदड़ मची। तब सभी अखाड़ों ने उस वक्त निर्णय लिया कि भविष्य में कुंभ के शाही स्नान से प्रधानमंत्री, अन्य वीवीआईपी और वीआईपी को दूर रखा जाएगा। अगर इनमें से किसी को आना है तो वह शाही स्नान के बाद ही आए। यह परंपरा तब से जारी है।
कुंभ मेला अधिकारी दीपक रावत का कहना है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को पत्र भेजेंगे।  इसमें आग्रह किया जाएगा कि शाही स्नान के दिन कोई भी वीआईपी हरिद्वार न आए।

 


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