प्रवासियों का दर्द : विपत्ति आते ही दिल्ली वाले अपने हो गए पराए

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बेगूसराय, 01 जून (हि.स.)। देश के विभिन्न शहरों से प्रवासी श्रमिकों के आने का सिलसिला लगातार जारी है। घर पहुंचते ही इन प्रवासियों की जान में जान आ रही है। उन्हें लगता है कि एक लंबी जंग जीतकर, वह वापस लौटे हैं। ऐसा हो भी क्यों न, जब मार्च में हुए लॉकडाउन के बाद से ही वह सब देश के बड़े-बड़े शहरों में फंसे हुए थे। सरकार की घोषणा और धरातलीय सच्चाई से रूबरू होने वाले यह श्रमिक, महानगरों के वैचारिक सोच की पोल खोल रहे हैं। इनकी कहानी बताती है कि महानगरों की हालत गांव से भी कई गुना बदतर है, वहां किसी को किसी से मतलब नहीं है। लोग मतलब सिर्फ अपने काम और आर्थिक लाभ के हिसाब से रखते हैं। महानगर को इन लोगों ने सजाया-संवारा, मालिक के घर की शोभा बढ़ाने में दिन रात लगे रहे, उद्योगपतियों के खजाने को बढ़ाने में अपना खून जलाया। जब कोरोना रुपी विपत्ति आई तो सभी अपने कहने वाले देखते ही देखते पराए हो गए। मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया, मकान मालिकों ने घर में रहने के लिए या तो बड़ी शर्त रख दी या जबरन घर से निकाल दिया।
पैदल चलने को हुए तो बॉर्डर पर धक्के खाए, दिल्ली की सरकार ने उन्हें पेंडुलम बना दिया। वह अपने गृह राज्य के नहीं रहे और ना ही जहां रह रहे थे उसने अपनाया। जिस मकान मालिक को प्रत्येक महीने की एक तारीख को चार साथी मिलकर छह हजार रुपया किराया देते थे, उसने अकेले से आठ हजार की डिमांड कर दी। बाहर भोजन की तलाश में निकलते थे तो धक्के खाने पड़े। इन्हीं परेशानियों से जूझते हुए रोज श्रमिक प्रवासी अपने घर की ओर लौट रहे हैं और सुबह से रात तक सदर अस्पताल में जांच करने वालों की भीड़ लगी रहती है। कोरोना जांच करवाने के लिए दिल्ली से पहुंची श्रमिकों की टोली ने जो बताया वह व्यवस्था पर करारा तमाचा लगाता है।
सोहन पासवान उत्तम नगर में एक मकान में चार लोगों के साथ रहकर छह हजार रुपया महीना किराया देकर रह रहे थे। रोज सुबह आठ बजे से पहले खाना लेकर निकल जाना और रात में सात-आठ बजे आना रूटीन था। आकर थके होने के कारण कभी खाना बनाया तो कभी चूड़ा आदि खाकर सो जाना होता था। जब लॉकडाउन लगा तो कमाई शून्य हो गई, 25 मार्च से ही पास के पैसे से किसी तरह दिन कटता रहा। दस अप्रैल को जब वह पैसा खत्म हो गया तो शुरू हो गई भोजन के लिए मारामारी। पुलिस की नजरों से छुप कर इधर-उधर से लेकर किसी तरह खाना खा रहे थे। मन में आशा थी कि घर जाकर भी क्या करेंगे, यहां रहेंगे तो शायद कुछ दिनों में सरकार छूट दे दे और उनकी जूता फैक्ट्री फिर चालू हो जाए लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इधर 20 मई को मकान मालिक ने आठ हजार रुपया महीना देने अथवा खाली कर देने का ऑर्डर दे दिया, तीन दिन तक हाथ पैर मारते रहे। कोई जुगाड़ नहीं मिला तो चौथे दिन सुबह-सुबह मकान मालिक ने रूम से बैग निकाल कर गेट पर ताला जड़ दिया।
मरता क्या न करता वाली हालत में सोहन और योगेन्द्र स्टेशन आ गए, जहां दो दिन तक प्लेटफार्म पर जाने की हिम्मत नहीं हुई। 29 तारीख को किसी तरह प्लेटफार्म पर पहुंचा तथा स्पेशल ट्रेन से बरौनी आ गया। अस्पताल में जांच के बाद एकांतवास केंद्र (क्वारेन्टाइन सेंटर) से होते हुए फिर घर जाएगा। पूंजी तो है नहीं यहां कुछ धंधा करेगा, स्थानीय स्तर पर उद्योग-धंधा भी नहीं है। इसलिए सब लोग बाहर जाने लगेंगे तो वह भी चला जाएगा। हालांकि इसने किसी हालत में दिल्ली नहीं जाने की बात कही है। कुछ ऐसी ही दर्दभरी दास्तां गांधीनगर में रहकर कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वाले रोहित एवं राजा, आजमनगर की झोपड़पट्टी में रहने वाली विनोद, ओखला में ईंट भट्ठा पर काम करने वाले रामविलास तथा बेयरिंग कंपनी में काम करने वाले राजेश महतों की भी है।

 


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