लंदन से मेलबर्न तक बलबीर सिंह ने बजाया था जीत का डंका

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जब डाक टिकट पर लगी फोटो तो समझ नहीं पाए क्या बोलें



चंडीगढ़, 25 मई (हि.स.)। बलबीर सिंह सीनियर का भले ही सोमवार की सुबह चंडीगढ़ के निकट मोहाली में निधन हो गया है लेकिन वह खेल प्रेमियों के दिलों में हमेशा अपनी जगह बनाए रखेंगे और नए हॉकी खिलाड़ियों को उनके जीवन से प्रेरणा मिलती रहेगी। बलबीर सिंह सीनियर को आज भले ही लोग ‘गोल मशीन’ के नाम से जानते हों लेकिन इसके पीछे उनकी मेहनत व संघर्ष है। जीवन के अंतिम पल चंडीगढ़ में बीताने वाले बलबीर सिंह सीनियर हमेशा की सकारात्मकता भरे विचारों को लोगों से साझा करते थे। यही कारण है कि वेंटीलेटर पर भी दो बार हार्ट अटैक आने के बावजूद वह कई दिनों से जिंदगी व मौत के बीच लड़ते रहे।

देश की आजादी के बाद वर्ष 1948 में पहली बार बलबीर सिंह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंदन में हुए ओलंपिक में देखा गया। अर्जेटीना के खिलाफ हुए इस मैच में पहली बार खेल रहे बलबीर सिंह ने एक के बाद एक छह गोल डाले। जिसमें एक हैट्रिक भी शामिल थी। यहीं से उनका नाम गोल मशीन पड़ा और भारतीय टीम को 9-1 से विजय दिलाई। बलबीर सिंह ने इस ओलंपिक का फाइनल मैच भी खेला। इसके बाद 1952 में एक बार फिर से भारतीय हॉकी टीम हेलसिंकी पहुंची। इस बार बलबीर सिंह भारतीय टीम के उपकप्तान थे जबकि केडी सिंह के हाथों में कप्तानी थी। इसके बावजूद बलबीर सिंह को ओलंपिक में भारत का झंडा थमाया गया।

उन्होंने ब्रिटेन के खिलाफ सेमिफाइनल में हैट्रिक लगाई और फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ पांच गोल किए। इस ओलंपिक में व्यक्तिगत गोल करने का रिकार्ड भी उनके नाम रहा। हेलसिंकी ओलंपिक में भारत के कुल 13 गोल थे। जिसमें से 9 गोल बलबीर सिंह ने किए थे। जो किसी भी खिलाड़ी का उस ओलंपिक में सर्वाधिक स्कोर था। बलबीर सिंह सीनियर को वर्ष 1956 में हुए मेलबर्न ओलंपिक में भारतीय टीम की कमान मिली। इस ओलंपिक मैच में उन्होंने पांच गोल दागे लेकिन वह चोटिल हो गए। जिस कारण उन्हें ग्रुप मैच छोडऩे पड़े। इसके बाद उन्होंने सेमिफाइनल और फाइनल मैच खेले। यह पहला मौका था जब भारतीय हॉकी टीम ने बलबीर सिंह की कप्तानी में गोल्ड मैडल जीता था।

बलबीर सिंह सीनियर को सम्मान देने के लिए तत्कालीन भारत सरकार ने वर्ष 1958 में उनके चित्र वाली एक डाक टिकट जारी की। यह ऐसा अवसर था जब बलबीर सिंह इस उपलब्धी के बारे में मीडिया को कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाए। वर्ष 1982 में दिल्ली में हुए एशियन गेम्स के दौरान उन्होंने मशाल जलाकर उदघाटन किया। वर्ष 2006 में जब उन्हें सर्वश्रेष्ठ सिख हॉकी खिलाड़ी का सम्मान घोषित किया गया तो उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के आधार पर इसे खारिज कर दिया। वर्ष 2015 में बलबीर सिंह को मेजर ध्यानचंद लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया।

 


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