लॉकडाउन का असर : शहरी लोगों के भरण पोषण के लिए गांव से जा रहा है पैसा

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बेगूसराय, 01 मई (हि.स.)। कोरोना के कहर से बचने के लिए लागू लॉकडाउन में इन दिनों ने उल्टी गंगा बह रही है। अब गांव में महानगर से पैसा नहीं आ रहा है, बल्कि गांव से ही रोज पैसा महानगर जा रहा है। यह हालत हुई है महानगरों में मजदूरों के बेरोजगार हो जाने के कारण। बेगूसराय जिले के 30 हजार से अधिक लोग देश के विभिन्न शहरों में रह रहे हैं। वहां विभिन्न प्रकार के श्रम कर वह गांव में पैसा भेजते थे, जिससे परिवार का पालन पोषण हो रहा था लेकिन लॉकडाउन ने उनकी हालत बदतर कर दी है। परदेश में रह रहे 90 प्रतिशत लोग दैनिक मजदूर थे, जो विभिन्न शहरों में अपने परिश्रम के बल पर पैसा कमा रहे थे और प्रत्येक माह अपने परिजनों के बैंक खाते में पैसा भेजते थे। लेकिन कोरोना संक्रमण के बाद जब लॉकडाउन हुआ तो उनके काम बंद हो गए। पास में जो पैसा था वह कुछ दिनों तक चला, लेकिन जब पैसा खत्म हो गया तो उनकी हालत बदतर हो गई। यह समाचार जब उन लोगों ने परिजनों से साझा किया तो परिजन भी परेशान हो गए। आखिर करें तो क्या करें, वहां से आया पैसा तो प्रत्येक माह घर चलाने में खर्च हो जा रहा था। बावजूद इसके परिजन बचाया गया पैसा शहर में रह रहे लोगों को भेज रहे हैं। जिनके पास पैसा नहीं है वह कर्ज लेकर भेज रहे हैं। इस दौरान कर्ज देने वाले कुछ महाजन मौके का फायदा भी उठा रहे हैं, ब्याज की दर बढ़ा दी गई है। बावजूद इसके लोग दूर के शहरों में रह रहे अपने परिजनों के लिए परेशान हैं तथा उन्हें पैसा भेज रहे हैं। यह नजारा जिला के तमाम बैंकों में रोज दिख रहा है। सभी बैंकों में जन धन योजना में आए पैसा निकालने के लिए तो भीड़ लगी ही है लेकिन उसी भीड़ में पैसा जमा करने वाले भी हैं, जो अपने परिजनों को पैसा भेज रहे हैं। इधर पैसा भेजने के चक्कर में एक बार फिर कथित तौर पर हवाला का कारोबार तेज हो गया है। शहर में रह रहे अधिकतर लोगों का किसी बैंक में खाता नहीं था। उन तक पैसा पहुंचाने के लिए भी धंधेबाज एक्टिव हैं। गांव के लोग शहर में रह रहे अपने परिजनों तक पैसा भेजने के लिए ऐसे धंधेबाज लोगों के घर पर जाकर पैसा जमा करते हैं जिसके बाद परदेश में रह रहे धंधेबाज के परिजन उसे फोन करते हैं‌। फोन पर सूचना मिलते ही दूरदराज के शहर में रह रहे लोगों तक वहां के छोटे हवाला कारोबारी पैसा पहुंचा देते हैं। इसके लिए चार प्रतिशत टैक्स लिया जा रहा है। गांव के कोई भी अगर दिल्ली में अपने परिजनों को एक हजार रुपया भिजवाना चाहते हैं तो उसके लिए उन्हें 40 रुपया टैक्स देना पड़ रहा है।


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