तिब्बत की आजादी की आशा न छोड़ें निर्वासित तिब्बती: दलाईलामा

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जब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पहली बार 1959 में तिब्बत पर आक्रमण किया था और तिब्बती लोगों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किया था तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि तिब्बती 60 साल के उत्पीड़न के बाद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाएंगे।



धर्मशाला, 08 अक्टूबर (हि.स.)। तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा ने कहा कि तिब्बत की आजादी के लिए वहां रह रहे तिब्बतियों ने कई तरह की यातनाएं सहने के बावजूद आजादी की आशा नहीं छोड़ी है, इसलिए निर्वासन में जीवन यापन कर रहे तिब्बतियों को भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए उनके साथ खड़े रहना होगा।
धर्मगुरु दलाई लामा ने यह उद्गार मंगलवार को केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। दलाई लामा ने निर्वासित तिब्बतियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि तिब्बती शरणार्थियों की कहानी अन्य शरणार्थियों के मामलों से अद्वितीय है। तिब्बती आज एक मील के पत्थर पर पहुंच गए हैं, जहां उन्होंने न केवल अपनी संस्कृति और परंपरा को संरक्षित किया है, बल्कि निर्वासन में एक पूर्ण विकसित लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना भी की है। इस प्रमुख उपलब्धि के लिए केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों दोनों का योगदान रहा है। जब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पहली बार 1959 में तिब्बत पर आक्रमण किया था और तिब्बती लोगों पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किया था तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि तिब्बती 60 साल के उत्पीड़न के बाद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाएंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि तिब्बती इसके लिए खुद पर गर्व कर सकते हैं। दलाई लामा ने केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के कर्मचारियों और तिब्बती नेतृत्व की विशेष रूप से अतिरिक्त कड़ी मेहनत करने की सराहना की और आगे भी उन्हें महान कार्य जारी रखने का आग्रह किया।

 


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