बिहार : बारिश के आगे बेहाल सुशासन

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स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल पटना में पानी ने ऐसा कोहराम मचाया कि आम से लेकर खास तक हर किसी को इसने बराबर शिकार बनाया है।



पटना, 05 अक्टूबर (हि.स.)। महज तीन दिनों की बारिश सुशासन को बहा ले जाएगी, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। जिस तरह से पटना जलमग्न हुआ और लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, वह सुशासन के बह जाने का ही ऐलान है।
यह भी विडंबना ही है कि हाल में रातोंरात चर्चा में आये एक होर्डिंग- ‘क्यों करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार’ शायद भगवान इंद्रदेव को पसंद नहीं आया। भगवान इंद्रदेव का जिक्र इसलिए, क्योंकि नेताओं को भगवान और ज्योतिष पर ज्यादा भरोसा है, बजाय इसके कि मौसम विभाग की बातों को तवज्जो दें।
मौसम विभाग ने पहले ही भारी बारिश का अनुमान जताते हुए प्रशासन को आगाह किया था लेकिन ‘बिहार में बहार है’ के सपनों में खोये नेताओं और अफसरों को भला इसके लिए कहां वक्त था। अब जबकि बारिश ने आम लोगों के साथ खास लोगों को अपनी चपेट में ले लिया तो नेताओं और प्रशासन की नींद टूटी। राजधानी की ड्रेनेज व्यवस्था इस भारी बारिश के आगे ध्वस्त हो गयी। नतीजा, पानी ने कोहराम मचाना शुरू कर दिया। पानी की निकासी न होने व तीन नदियों गंगा, सोन और पुनपुन से घिरा पटना शहर झील में तब्दील हो गया।
स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल पटना में पानी ने ऐसा कोहराम मचाया कि आम से लेकर खास तक हर किसी को इसने बराबर शिकार बनाया है। पटना का ड्रेनेज सिस्टम हांफ रहा है, कहना पूरी तरह से गलत होगा। स्कूल से लेकर अस्पतालों तक और सड़क से लेकर गली-मोहल्लों तक पानी ने एक समान कब्जा जमाया हुआ है। गरीबों की झोंपड़ी से लेकर नेताओं और अफसरों के बंगले में कहीं घुटनों तक तो कहीं कमर और कहीं गर्दन तक पानी है। नतीजा, राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी स्वयं तीन दिनों तक बंगले से बाहर नहीं निकल पाये।
आखिऱकार तीन दिनों के बाद एनडीआरएफ की टीम व प्रशासन ने मिलकर सुशील मोदी और उनके परिवार को सामान के साथ पानी से बाहर निकाला। इस मामले में सुशील मोदी खुशनसीब हैं कि उन्हें राज्य के उप मुख्यमंत्री के रूप में वीआईपी का दर्जा हासिल है। इसीलिए प्रशासन ने उनकी सुधि ली लेकिन हर किसी की किस्मत उनके जैसी नहीं है। यही कारण है कि सेना के हेलीकॉप्टरों से गिराये जाने वाली खाद्य सामग्री की तरफ लोग टकटकी लगाये हैं।
हद तो यह है कि पटना की इस दुर्गति की सही वजह तलाश कर उसे दुरुस्त करने की बजाय नेताओं की तरफ से एक से बढ़कर एक हास्यास्पद बयान दिये जा रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने तो सारा कसूर हथिया नक्षत्र का बता दिया। गिरिराज सिंह जैसे कुछेक नेता इसे सरकार और प्रशासन की विफलता मान रहे हैं। ऐसा है भी, क्योंकि सालों से जल निकासी का कोई फुलप्रूफ प्लान बना ही नहीं। जो गटर व नालियां हैं भी, उनकी न तो सही ढंग से साफ-सफाई होती है और न ही रखरखाव पर ध्यान दिया जाता है। अगर जरा भी ईमानदारी से काम हुआ होता, तो आज पटना इस हालत में नहीं होता।
पिछले कुछ साल में अन्य शहरों की ही तरह पटना में भी नेताओं, अफसरों और प्रशासन की मिलीभगत से ऊंची-ऊंची इमारतें तो बनीं लेकिन जल निकासी पर कोई काम नहीं हुआ। जल निकासी के लिए 1968 में बने ड्रेनेज सिस्टम पर ही दबाव बढ़ता गया। पटना म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अनुसार शहर की जल निकासी व्यवस्था केवल प्रतिदिन एकत्र होने वाले पानी की निकासी में ही सक्षम है। यही कारण है कि तीन दिनों की ही बारिश में पटना पानी-पानी हो गया है।
हाल में आई एक रिपोर्ट का दावा किया गया है कि पटना की 13 प्रतिशत सड़कें ऐसी हैं, जहां जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अधिकारियों का कहना है कि सौ मिलीलीटर तक बारिश के पानी को निकालने में ही एक से दो दिन का वक्त लग सकता है। ऐसे में सोचा जा सकता है कि तीन दिनों में हुई 340 मिलीलीटर बारिश के पानी को आगामी दिनों में बनने वाले इस स्मार्ट सिटी से बाहर निकालने में कितना वक्त लगेगा। खैर, अब लकीर पीटने से कुछ होने वाला नहीं है, ऐसे में जरूरत है प्रशासन को इससे सीख लेकर सचेत होने की ताकि भविष्य में फिर कभी इस तरह के हालात पैदा न हों। इसके लिए पहला काम ड्रेनेज सिस्टम को सुधारना होना चाहिए।

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