‘गोलवरकर’ के प्रयासों से हुआ था जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय

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महाराजा हरिसिंह को स्वीकार्य नहीं थी नेहरू की सत्ता



लखनऊ, 06 अगस्त (हि.स.)। महाराजा के दरबारियों, सहयोगियों और मंत्री परिषद के वजीरों का पूरा जोर था कि राष्ट्र के हित में जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में हो जाय। लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे कई व्यक्तियों ने भी प्रयास किया, परन्तु महाराजा तैयार नहीं हुए। वे नेहरू की सत्ता स्वीकार नहीं करना चाहते थे।
राजनेताओं के प्रयास असफल हो चुके थे। समय की नाजुकता बढ़ती जा रही थी। उधर पाकिस्तान की फौज कश्मीर के द्वार पर पहुंच चुकी थी। ऐसी परिस्थिति में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने व्यक्तिगत तौर पर मेहरचन्द महाजन द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिव राव गोलवरकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ को संदेश भेजकर आग्रह किया कि महाराजा को विलय के लिए तैयार करने में वे अपने प्रभाव का उपयोग करें। यह संदेश जैसे ही श्रीगुरुजी को मिला, इस नाजुक प्रश्न का समाधान करने तथा अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति के लिए अपने सभी कार्यक्रम स्थगित कर विमान द्वारा नागपुर से दिल्ली और 17 अक्टूबर, 1947 को दिल्ली से श्रीनगर पहुंचे। वहां पंडित प्रेमनाथ डोगरा और मेहरचन्द महाजन के प्रयास से महाराज हरिसिंह से 18 अक्टूबर को मुलाकात हुई। जिस महाराजा पर देश के अनेक नेताओं का कुछ भी असर नहीं हुआ, उस महाराजा हरिसिंह ने एक साधारण वेश वाले राष्ट्रीय तपस्वी के आगे सिर झुका दिया। उन्हें अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा का महत्व समझ में आ गया।
इस मुलाकात के दौरान महाराजा हरिसिंह ने श्रीगुरुजी से सवाल किया कि ‘हमारी पूरी रियासत पाकिस्तान पर अवलम्बित है। सब रास्ते सियालकोट, रावलपिंडी की ओर से हैं। रेल भी सियालकोट की ओर से है। हवाई अड्डा लाहौर का है। हिन्दुस्थान के साथ मेरा किस तरह संबंध बन सकता है? श्रीगुरुजी ने कहा कि आप हिन्दू राजा हैं। पाकिस्तान से विलय करने से आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना होगा। यह ठीक है कि अभी हिन्दुस्थान से रास्ते, रेल या हवाई मार्ग का कोई संबंध नहीं है किन्तु यह सब शीघ्र ही ठीक हो जाएगा। कहा कि आपका और जम्मू-कश्मीर रियासत का भला इसी में है कि आप रियासत का हिन्दुस्थान में विलय कर दें।
इस वार्ता के बाद महाराजा हरिसिंह ने विलय का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया और श्रीगुरुजी उन्हें आश्वस्त करते हुए स्वयंसेवकों को जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए अपने रक्त की अंतिम बूंद तक बहाने का निर्देश देकर चले गए। इस तरह जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कराने में ‘श्रीगुरुजी’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

 


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