लोकसभा : मानव अधिकार संरक्षण कानून में संशोधन से जुड़ा विधेयक पारित

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मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को चर्चा के लिए पेश करते और इस संबंध में जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री ने बताया कि विधेयक से केन्द्र एवं राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल से घटकर तीन साल हो जाएगा



नई दिल्ली, 19 जुलाई (हि.स.)। लोकसभा में शुक्रवार को मानव अधिकार संरक्षण कानून में संशोधन से जुड़ा विधेयक पास हो गया। इस दौरान केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने सदन को आश्वसन दिया कि नए कानून से केन्द्र और राज्यों से जुड़े मानवाधिकार आयोग अधिक प्रभावशाली और सशक्त बनेंगे।

मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को चर्चा के लिए पेश करते और इस संबंध में जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री ने बताया कि विधेयक से केन्द्र एवं राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल से घटकर तीन साल हो जाएगा। इसके अलावा इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों को ही क्रमश: केन्द्र और राज्य आयोगों का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रवधान भी हट जाएगा। अब उनके स्थान पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश भी इन पदों पर नियुक्त किए जा सकेंगे।

राय ने कहा कि नए वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिलने से मानवाधिकार आयोग को लोगों के मूलभूत अधिकारों के सरक्षण में आसानी होगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के सिविल सोसाइटी की आयोग में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के सुझाव पर काम करते हुए आयोग में सभी समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया है। उन्होंने कहा कि इससे आयोग में रिक्तियों को भरने में आसानी होगी और चयन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता आएगी। इससे केन्द्र शासित प्रदेशों के लोग दिल्ली आने की बजाय आस-पास के राज्यों के मानवाधिकार आयोग के पास अपना मामला रख सकते हैं। इसके अलावा आयोग में एक महिला सदस्य को शामिल करना अनिवार्य होगा।

विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता शशि थरूर ने विधेयक को बनावटी बताते हुए कहा कि सरकार ने एक सशक्त कानून बनाने का महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए नया विधेयक लाई है, लेकिन यह उसके अनुरूप नहीं है।सरकार ने जवाब न देने वाले अधिकारियों पर अवमानना करने, राजनीतिक लोगों को इसमें शामिल होने से रोकने और रिक्तियों को समय से भरने का प्रावधान नहीं किया है। कई स्थानों में विधेयक में स्पष्टता का भी अभाव है।

 


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