कांवड़ के स्वरूप देखकर विस्मित हो जाते हैं लोग

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कांवड़ कई प्रकार की होती है। अपनी आस्था और श्रद्धा के आधार पर कांवड़िये विभिन्न प्रकार की कांवड़ लेकर आते हैं और भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।



मेरठ, 19 जुलाई (हि.स.)। श्रावण मास की कांवड़ यात्रा शुरू होते ही सड़कों पर कांवड़ियों का आवागमन शुरू हो गया है। विभिन्न प्रकार की कांवड़ के स्वरूप देखकर लोग विस्मित हो रहे हैं।
कांवड़ यात्रा के बारे में मेरठ के पंडित सुमंत्र कुमार ने बताया कि कांवड़ कई प्रकार की होती है। अपनी आस्था और श्रद्धा के आधार पर कांवड़िये विभिन्न प्रकार की कांवड़ लेकर आते हैं और भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। कई कांवड़िये मनौती पूरी होने पर अपनी बोली हुई कांवड़ लेकर आते हैं।
सामान्य कांवड़ 
हरिद्वार, गंगोत्री, नीलकंठ, ऋषिकेश आदि स्थानों से श्रद्धालुओं द्वारा कांवड़ लाकर भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाया जाता है। इसमें कांवड़िये अपनी यात्रा के दौरान किसी भी स्थान पर रूककर आराम कर सकते हैं और कांवड़ को स्टैंड पर टांग दिया जाता है। इसे सामान्य या झूला कांवड़ कहते हैं।
खड़ी कांवड़ 
यह कांवड़ बहुत ही कठिन मानी जाती है। यात्रा के दौरान कांवड़ को सिर्फ कंधे पर रखा जा सकता है। इस कठिन कांवड़ को लाने के लिए कांवड़िये के साथ एक सहयोगी होता है। कांवड़िये के आराम करने के दौरान सहयोगी कांवड़ को अपने कंधे पर रखे रहता है। यह विशेष रूप से मनौती पूरी होने पर लाई जाती है।
डाक कांव
डाक कांवड़ में कांवड़िये लगातार चलते रहते हैं। एक निश्चित समय के भीतर अपनी कांवड़ियों को अपनी यात्रा पूरी करनी होती है। इसमें कांवड़िये समूह में यात्रा करते हैं और दौड़कर अपनी दूरी पूरी करते हैं। कई स्थानों पर रिकॉर्ड समय में डाक कांवड़ लाने वालों को पुरस्कृत भी किया जाता है।
दंडवत कांवड़
इस प्रकार की कांवड़ को सबसे कठिन बताया जाता है। यह कांवड़ विशेष मनौती पूरी होने पर लाई जाती है। इस कांवड़ यात्रा को कांवड़िये द्वारा लेटकर पूरा किया जाता है। कांवड़िये हरिद्वार से अपने निकटतम शिव मंदिर तक दंडवत करके कांवड़ लाता है। इसके लिए कांवड़िया बहुत पहले ही हरिद्वार से चल देता है।
कांवड़ लाने के नियम
कांवड़ यात्रा पर जाने वाले को अपने विचार सात्विक रखने होते हैं। यात्रा में नशा करना, मांस-मदिरा का सेवन करना, तामसिक भोजन करना वर्जित होता है। बिना स्नान किए कांवड़ को हाथ नहीं लगाया जाता है। चमड़े की किसी वस्तु को नहीं छुआ जाता। कांवड़ को अपने सिर के ऊपर से लेकर जाना वर्जित होता है। कांवड़ यात्रा के दौरान किसी वाहन और चारपाई का उपयोग नहीं किया जाता।
बोल बम का नारा 
पंडित सुमंत्र ने बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये हर हर महादेव, बोल बम का जयघोष करते हुए चलते हैं। पैदल यात्रा करते हुए कांवड़ लाने पर एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है। उसके सभी पापों का अंत होना माना जाता है। मृत्यु के पश्चात भगवान शिव के लोक की प्राप्ति होती है।

 


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