आपातकाल के 44 सालः फिरोजाबाद से नागपुर जाते समय गिरफ्तार हुए थे बाला साहब देवरस

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लोकतंत्र सेनानी श्री यादव बताते हैं कि जेपी आन्दोलन में भाग लेने के बाद पुलिस ने उनकी व उनके साथियों की प्रयास गिरफ्तारी के शुरू कर दिए।



फिरोजाबाद, 25 जून (हि.स.)। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में 25 जून 1975 कोे आपातकाल की घोषणा के बाद जेल की यात्रा करने वाले लोकतंत्र सेनानियों के मन में आज 44 साल बाद भी उन दिनों की याद ताजा बनी हुई है। लोकतंत्र सेनानी सुरेश चन्द्र यादव इसे इतिहास का काला दिन मानते हैं। उन दिनों को याद करके आज भी उनके मन में गुस्सा आ जाता है। उनका कहना है कि उन्हें जेपी आन्दोलन में भाग लेने पर दो माह तीन दिन की जेल यात्रा करनी पड़ी थी। इस दौरान उन्होंने कई यातनाएं सहीं।
शिकोहाबाद के यादव कालोनी निवासी 62 वर्षीय सुरेश चन्द्र यादव बातचीत  करते हुए बताया कि वह उस समय इंटरमीडिएट के छात्र थे। तब उनकी उम्र 18 साल थी। वह आरएसएस से जुड़े हुए थे तथा विद्यार्थी परिषद के तहसील स्तर पर संगठन मंत्री थे। वह बताते हैं कि 25 जून 1975 की रात जिस समय आपातकाल की घोषणा हुई उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस व संघ के प्रमुख नेता फिरोजाबाद के पीडी जैन इण्टर कालेज में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में मौजूद थे। वह भी इस शिविर में ओटीसी कर रहे थे। शिविर का समापन आपातकाल लगने के कारण नियत समय से एक दिन पहले ही कर दिया गया। उसके बाद सभी स्वयंसेवक अपने अपने घरों को रवाना हो गए। सरसंघचालक फिरोजाबाद से नागपुर जाते समय रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिये गए। आपातकाल की घोषणा के बाद बिहार से जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन की शुरूआत की तो उन्होंने भी अपने अन्य साथियों के साथ इस आन्दोलन में भाग लिया।
2 दिसम्बर 1975 को साथियों के साथ दी थी गिरफ्तारी
लोकतंत्र सेनानी श्री यादव बताते हैं कि जेपी आन्दोलन में भाग लेने के बाद पुलिस ने उनकी व उनके साथियों की प्रयास गिरफ्तारी के शुरू कर दिए। जिसके बाद 2 दिसम्बर 1975 को आरएसएस के बृजेश कुमार मिश्रा के नेतृत्व में उन्होंने अपने आन्दोलनकारी साथी रामप्रकाश शर्मा, देशदीपक सिन्हा, शिवदत्त बघेल आदि के साथ शिकोहाबाद थाने पहुंचकर गिरफ्तारी दी। श्री यादव बताते हैं कि गिरफ्तारी देने के बाद आरएसएस नेता बृजेश कुमार मिश्रा व उनको तत्कालीन इंस्पेक्टर ने कड़ी से कड़ी यातनाएं दी। बृजेश कुमार मिश्रा के नाखून भी खींचे। इसके बाद दूसरे दिन 3 दिसम्बर 1975 को उन्हें जनपद मैनपुरी की जेल में भेज दिया गया।
जेल में की थी भूख हड़ताल
यादव बताते हैं कि जेल में उन्हें अच्छा खाना उपलब्ध नहीं हुआ तथा उन्हें यातनाएं दी गई। इसके विरोध में उन्होंने जेल में भी आन्दोलन करते हुए भूख हड़ताल की। उसके बाद जेल अधिकारियों द्वारा उन्हें इलाहाबाद की नैनी जेल भेजने की धमकी दी गई। लेकिन वह आन्दोलन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने जेल से ही इंटरमीडिएट की परीक्षा दी थी। जेल प्रशासन द्वारा उन्हें शिकोहाबाद के एके कालेज में परीक्षा दिलाने के लिए लाया जाता था।
5 फरवरी 1976 को हुए थे रिहा
श्री यादव बताते हैं कि दो माह तीन दिन की जेल यात्रा करने के बाद 5 फरवरी 1976 को जब वह जेल से रिहा हुए तो जेल पर उनकी एक झलक पाने के लिये लोगों की काफी भीड़ थी। लोगों में उत्साह था। जेल से निकलने के बाद उनका फूल-मालाओं से स्वागत किया गया।
लोकतंत्र सेनानी सुरेश चन्द्र यादव का कहना है कि साल 2005 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने लोकतंत्र के रक्षकों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देते हुए उन्हें पेंशन देकर सम्मानित किया। उनका मानना है कि भारतीय राजनीति में 25 जून 1975 का दिन काला दिन है। इसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। सरकारों को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए ऐसी स्थिति से बचना चाहिए।


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