आपातकाल के 44 साल:घर की कुर्की से भी नहीं टूटा था हौसला

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अरूण वशिष्ठ बताते हैं कि आपातकाल के दौरान वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल का उन्हें पूरा सहयोग मिला। वह उस समय मेरठ में संघ प्रचारक थे। इमरजेंसी में रामलाल के साथ वह भी जेल गए।



मेरठ, 24 जून (हि.स.)। 25 जून 1975 को जैसे ही देश में आपातकाल की घोषणा हुई तो सत्ता के विरोधी संगठनों के कार्यकर्ताओं व नेताओं की धरपकड़ शुरू हो गई। मेरठ में भी आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े नेताओं को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया गया। घर की कुर्की भी संघ कार्यकर्ताओं के हौसलों को डिगा नहीं पाई। मेरठ काॅलेज छात्र संघ के महामंत्री व एबीवीपी कार्यकर्ता अरूण वशिष्ठ के साथ ही भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल ने भी लंबा समय जेल में बिताया।
आपातकाल की त्रासदी के बारे में भाजपा के वरिष्ठ नेता अरूण वशिष्ठ बताते हैं कि इमरजेंसी के समय वह मेरठ काॅलेज छात्र संघ के महामंत्री व एबीवीपी कार्यकर्ता थे। इमरजेंसी लगते ही उनके खिलाफ तीन मुकदमे दर्ज कर दिए गए। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की मेरठ काॅलेज में उन्होंने सभा कराई थी। संघ के निर्देश पर वह भूमिगत रहकर कार्य करने लगे। चारों ओर भय और आशंका का वातावरण था। संघ के कार्यकर्ताओं को पकड़कर जेलों में डाला जा रहा था। ऐसे में संगठन के कार्यकर्ता जेल जाने वाले लोगों के परिवारों की सहायता कर रहे थे। वह भी भूमिगत रहकर कार्य कर रहे थे। इसी बीच पांच जुलाई 1975 को उनके घर की कुर्की कर ली गई। घर का एक-एक सामान पुलिस उठाकर ले गई। इससे भी परिवार का हौसला नहीं डिगा। उनके पिता पर भी दबाव बनाया जाने लगा। इसके बाद संघ पदाधिकारियों के परामर्श से उन्होंने गिरफ्तारी दे दी।
संघ प्रचारक रामलाल भी जेल चले गए 
अरूण वशिष्ठ बताते हैं कि आपातकाल के दौरान वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन रामलाल का उन्हें पूरा सहयोग मिला। वह उस समय मेरठ में संघ प्रचारक थे। इमरजेंसी में रामलाल के साथ वह भी जेल गए। 27 जनवरी 1976 को उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन तत्काल ही मीसा का मुकदमा दर्ज करके फिर से जेल भेज दिया गया। आठ मार्च 1977 को इमरजेंसी हटने के बाद ही जेल से रिहाई हो पायी। वह कुल 19 महीने तक जेल में बंद रहे।
जेल में किया था सत्याग्रह
जेल भेजने के बाद भी देशप्रेमियों का हौसला नहीं डिगा और वह सरकारी अत्याचार के खिलाफ आंदोलन करते रहे। जब पुलिस लोकतंत्र सेनानियों को हथकड़ी लगाकर ले जाना चाहती थी तो अरूण वशिष्ठ और उनके साथियों ने जेल में बवाल कर दिया। इसके बाद मजिस्ट्रेट को खुद जेल आकर मुकदमा सुनना पड़ा। उन्होंने संघ प्रचारक रामलाल के निर्देशन में जेल में सत्याग्रह किया।
माफी मांगने के दबाव को नकार दिया
लोकतंत्र सेनानी रविंद्र नादर बताते हैं कि मीसा के बंदियों पर माफी मांगने का दबाव डाला जा रहा था, लेकिन कोई भी लोकतंत्र सेनानी सरकारी दमनचक्र के आगे नहीं झुका और माफी नहीं मांगी। पूर्व विधायक अमित अग्रवाल ने भी बेखौफ होकर सरकारी दमनचक्र का सामना किया। समाजवादी चिंतक गोपाल अग्रवाल ने भूमिगत रहकर पूरे आपातकाल के दौरान लोगों की सहायता की।
दादी की मौत, मां को कैंसर हुआ
अरूण वशिष्ठ ने बताया कि जेल जाते समय उनकी उम्र साढ़े 22 साल थी। 19 माह की जेल के दौरान उनके माता-पिता और संगठन के पदाधिकारियों ने हौसला बंधाया। इसी दौरान उनकी दादी की मौत हो गई। डीएम ने पैरोल दे दी, लेकिन सरकार ने नामंजूर कर दी। इसी बीच मां को कैंसर हो गया, लेकिन उनका हौसला नहीं डिगा। एक बार जेल में राखी बांधने आई बहन को भी वापस लौटना पड़ा। उत्पीड़न और शोषण के इस दौर में भी परिजनों ने हमेशा हौसला बंधाया।

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