माइक पोम्पियो की भारत यात्रा के निहितार्थ

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ट्रम्प के विश्वस्त सहयोगी माइक पोम्पियो के लिए भारत यात्रा (25 से 27 जून) के बीच व्यापारिक, सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक और एस-400 मिसाइल रोधी सिस्टम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर विदेश मंत्री तक की वार्ता में टेढ़े मोड़ आ सकते हैं।



लॉस एंजेल्स, 22 जून (हि.स.)। ‘मोदी है, तो मुमकिन है’, के उद्घोष के बीच विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब अमेरिका मिडल ईस्ट में ईरान के साथ उलझ रहा है, तो पूर्व एशिया में व्यापार युद्ध को लेकर चीन के साथ वह आर-पार के समझौते के मूड में दिखाई पड़ रहा है। उत्तरी कोरिया में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की इतनी कोशिश ज़रूर होगी कि वह ओसाका (जापान) में जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में इस बार अपने मित्र देशों-नाटो एवं ग़ैर नाटो सदस्य देशों का कूटनीतिक दृष्टि से मित्रता भाव प्रकट करने में सफल हो सकें।
ट्रम्प के विश्वस्त सहयोगी माइक पोम्पियो के लिए भारत यात्रा (25 से 27 जून) के बीच व्यापारिक, सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक और एस-400 मिसाइल रोधी सिस्टम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर विदेश मंत्री तक की वार्ता में टेढ़े मोड़ आ सकते हैं। इन सभी मुद्दों पर ट्रम्प प्रशासन में वरिष्ठ अधिकारियों की मानें, तो ये सभी ऐसे मुद्दे नहीं हैं, जिन पर एक-दो बैठकों अथवा इस यात्रा में किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव-2020 की दृष्टि से ट्रम्प की ‘बाय अमेरिका, हायर अमेरिका’ की नीति के मामले में भारत के लाखों आईटी कर्मियों के स्थायी निवास अर्थात ग्रीन कार्ड में कोई तत्काल निर्णय निकलने की उम्मीद करना बेमाने होगा। मोदी सरकार में नवनियुक्त विदेश मंत्री एस. जयशंकर एक मँजे हुए कूटनीतिज्ञ हैं और वह अब अपने समकक्ष विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ परिफ़्रेंसेस ट्रेड’ पर खुलकर बातचीत कर सकते हैं। मुमकिन है, एस. जयशंकर दोनों देशों के बीच 126 अरब के व्यापार में एक विकासशील देश के नाते भारत को अरसे पहले मिली मात्र साढ़े पांच अरब डॉलर पर व्यापारिक रिश्ते को बिगड़ने से बचाने में सफल हो जाएं।
देखना यह है कि पोम्पियो इस व्यापारिक रिश्ते को अगली कितनी वार्ता तक घसीट कर ले जा सकते हैं? हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन में भारत का पलड़ा भारी है, जो ट्रम्प की एक संतुलन भरी व्यापार नीति के आड़े आ रही है। इसके बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्री को यह बखूूबी समरण रहेगा कि उसे दक्षिण पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते तेवरों को संतुलित करने में भारत के अलावा कोई अन्य देश नहीं मिलेगा। इस दिशा में भारत तेल आपूर्ति के मामले में ईरान से सस्ते और सहज किश्तों पर तेल की ख़रीद के बावजूद रिश्ते दरकिनार रखता है, तो अमेरिका को आभारी रहना चाहिए।
यह जग जाहिर है कि अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में आतंकवाद के मामले में भारत का खुलकर सहयोग दिया है। इस जद्दोजहद में चीन ने पाकिस्तान के साथ सामरिक रिश्तों के बावजूद जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी लिस्ट में शामिल कराए जाने में साथ दिया है। भारत और अमेरिका, दोनों के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा है। इस दृष्टि से भारत की कोशिश होगी कि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान को अलग-थलग रखने के साथ-साथ सुरक्षा की दृष्टि से भी उसके अमेरिका से रिश्ते नई बुलंदी पर चढ़ते रहें। इसमें एक बाधा रूस से मिसाइल रोधी एस-400 सिस्टम के सौदे को लेकर आ सकती है। ठीक इसी मामले में अमेरिकी नीति स्पष्ट है और उसने अपने नाटो सहयोगी टर्की को भी रूस से एस-400 मिसाइल रोधी खरीदने पर रिश्ते तोड़ने की धमकी दी है। इस मुद्दे पर अमेरिका काटसा अर्थात ‘काउंटरिंग अमेरिका एडवरसरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट’ के तहत बंधा है।
भारत की समस्या यह है कि वह न तो रूस के साथ सात दशक पुराने रिश्तों को दरकिनार कर सकता है और न ही एस-400 मिसाइल रोधी कॉन्ट्रैक्ट को ही रद्द कर सकता है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर विदेश मंत्री तक किसी नतीजे की आस रखना बेमाने होगा। ट्रम्प और मोदी जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में कुछ समय निकाल पाते हैं, तो दोनों देशों के लिए इन मुद्दों को लेकर किसी नतीजे पर निकल पाना सहज होगा।

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