ईरान पर सैन्य कार्रवाई पर निर्देश और फिर वापस लिए जाने पर डिबेट

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ट्रम्प ने शुक्रवार को ‘एनबीसी’ ‘के चक टाड को एक विशेष इंटेरव्यू में कहा, ‘घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदलते रहे, अंतिम क्षणों तक ग्रीन सिग्नल नहीं दिए गए।’ उन्होंने साफ़ तौर पर कहा, ‘यह कहना गलत है कि सैन्य कार्रवाई के निर्देश दिए गए, अमेरिका के लड़ाकू विमान आसमान में उतर आए थे।’ यह इंटरव्यू रविवार को प्रसारित होगा।



लॉस-एंजेल्स, 22 जून (हि.स.)। ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई पर पहले सहमति और फिर अगले दस मिनट में निर्देशों को वापस लिए जाने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फैसले पर अमेरिकी मीडिया में डिबेट शुरू हो गई है।इस डिबेट में कहा जा रहा है कि क्या यह वही डोनाल्ड ट्रम्प है, जो अपने सभी संबोधनों में ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ की बात करते रहे हैं और घरेलू, विदेश और रक्षा नीतियों में अपने पूर्वराष्ट्रपतियों को कमज़ोर कहते आए हैं। हालांकि ट्रम्प ने एक बार फिर कहा कि वह ईरान से युद्ध नहीं चाहते। उन्होंने ईरान से बिना किसी शर्त वार्ता का प्रस्ताव किया है। उनका कहना है कि युद्ध होता है, तो ईरान तबाह हो जाएगा। उधर ईरान ने भी कहा है कि वह युद्ध नहीं चाहते लेकिन ट्रम्प के साथ वार्ता से इनकार कर दिया है।

ट्रम्प ने शुक्रवार को ‘एनबीसी’ ‘के चक टाड को एक विशेष इंटेरव्यू में कहा, ‘घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदलते रहे, अंतिम क्षणों तक ग्रीन सिग्नल नहीं दिए गए।’ उन्होंने साफ़ तौर पर कहा, ‘यह कहना गलत है कि सैन्य कार्रवाई के निर्देश दिए गए, अमेरिका के लड़ाकू विमान आसमान में उतर आए थे।’ यह इंटरव्यू रविवार को प्रसारित होगा।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके मस्तिष्क में सैन्य कार्रवाई के बारे में विचार आ-जा रहे थे, तब यह विचार भी आ रहा था कि ईरान ने एक मानव रहित टोही ड्रोन विमान को मार गिराया है, तो क्या उन्हें सैन्य कार्रवाई में ग़ैर आनुपातिक 150 नागरिकों की जानें लेना उपयुक्त होगा?

राष्ट्रपति के इस रवैए पर उनके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों, रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया में बहस छिड़ गई है। कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य रैंड पाल और सिनेटर ग्राहेम लिंडसे ने ट्रम्प के फैसले का स्वागत किया है।

पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में बहरीन में अमेरिका के पूर्व राजदूत एडम एरेलि ने कहा कि ट्रम्प ने ईरान के विरुद्ध कूटनीतिक एकजुटता के प्रयास नहीं किए, पेंटागन में मुख्य अधिकारी की अनुपस्थिति रही और नेशनल सुरक्षा काउंसिल के पास पर्याप्त विकल्पों का अभाव था।

 


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