गाजीपुर में चलती रहेगी विकास की रेलगाड़ी या रुकेगा विकास का पहिया

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गाजीपुर में चलती रहेगी विकास की रेलगाड़ी या होगी माफियाराज की वापसी!

गाजीपुर, 16 मई (हि.स.)। गाज़ीपुर के चुनाव में एक तरफ विकास के नए आयाम और कीर्तिमान हैं तो दूसरी तरफ माफियाराज की वापसी का खतरा।
क्षेत्र के लोगों ने गत 5 साल में ऐसे ऐसे काम होते देखे जो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। जिसके दम पर जातिगत आधार पर काफी कठिन कही जाने वाली सीट पर भी मनोज सिन्हा जीत के प्रति आशान्वित नजर आ रहे हैं। वही गठबंधन प्रत्याशी के रूप में आतंक व माफियागिरी का दूसरा नाम कहे जाने वाले मुख्तार अंसारी के बड़े भाई भी जातिगत समीकरण को लेकर जीत के प्रति आशान्वित नजर आ रहे हैं। ऐसे में जनपद के लोगों को यह तय करना होगा कि क्या विकास के रेल गाड़ी चलती रहेगी या जातिवाद के काकस में फंसकर विकास की गति को रोकेंगे।
 गौरतलब हो कि 2014 में मनोज सिन्हा के सांसद बनने के साथ ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान पाने के बाद गाजीपुर के भाग्य खुल गए और लगातार विकास का ऐसा दौर चल पड़ा। स्थानीय सांसद और केंद्रीय रेल राज्य मंत्री का कोई भी एक ऐसा दौरा नहीं बचता था, जिसमें गाजीपुर के लिए कोई सौगात ना आई हो। सीधे-सीधे कहे तो अपने पूरे कार्यकाल के दौरान दिल्ली से जब जब मनोज सिन्हा गाजीपुर पहुंचे कोई न कोई परियोजना लेकर ही पहुंचे।
इसके अतिरिक्त अन्य माध्यमों से भी सोलर लाइट, हैंडपंप, सड़क, स्मार्ट क्लासेज के लिए स्मार्ट टीवी, कंप्यूटर, सामुदायिक भवन, वाईफाई की बाढ़ सी आ गई। जनपद का कोई ऐसा गांव नहीं बचा जहां इन सुविधाओं की व्यवस्था न की गई हो। जबकि रेल परियोजनाओं, मेडिकल कॉलेज, स्टेडियम, स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, नेशनल हाईवे इत्यादि की बड़ी अलग से परियोजनाएं भी जनपद में आई। मनोज सिन्हा द्वारा जनपद में कराए गए विकास कार्य से जनपद ही नहीं बल्कि पड़ोस के जनपदों में भी बड़ी चर्चा होने लगी व गाजीपुर के विकास कार्यों को लेकर स्थानीय लोगों ने यह भी कहना शुरू कर दिया श्री सिन्हा राजनीति का देवता है। ऐसे में पार्टी द्वारा कहीं अन्य सीट का चयन का सुझाव देने के बावजूद अपने विकास कार्यों के दम पर मनोज सिन्हा ने जातिगत आंकड़े से काफी खराब माने जाने वाली सीट पर दावेदारी की और स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव लड़ूंगा तो गाजीपुर से वरना कहीं से नहीं।
 दूसरी तरफ सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में पूर्व सांसद अफजाल अंसारी हैं जो आतंक का पर्याय कहे जाने वाले बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बड़े भाई हैं। लोगों को मुख्तार अंसारी के माफियाराज का वह दौर भी याद है जब विरोधियों की हत्या करना आम बात होती थी। उनके गुर्गे आम लोगों को खौफ के साये में जीने के लिए मजबूर रखते थे। उनकी मर्जी के बिना कोई ठेका पट्टा नहीं ले सकता था। दुस्साहस करने वाले को सबक सिखा दिया जाता था। जिस मकान या जमीन पर नज़र पड़ जाती थी, उसे येन केन प्रकारेण हथिया लिया जाता था। अपहरण, फिरौती, रंगदारी का चलन उनके संरक्षण में आम था, मऊ दंगों को याद करके लोग आज भी सिहर उठते हैं। इसके साथ ही मनोज सिन्हा द्वारा सभी जन संवाद कार्यक्रमों में खुले मंच से दावा किया जा रहा है कि आगामी 5 वर्षों में अब तक जनपद को मिले धन का डेढ़ गुना अधिक धन मिलेगा। मंच से भाषण के दौरान उनके द्वारा यह कहा जाना कि अब तक आपके वोट रूपी कर्ज का ब्याज दे दिया है, अब आने वाले समय में आपके द्वारा प्राप्त वोट का चक्रवृद्धि ब्याज सहित डेढ़ गुना धनराशि से जनपद को और विकसित करने का कार्य करूंगा।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जनपद के मतदाता विकास की रेलगाड़ी को अनवरत चलते रहने देंगे या जातिवाद के काकस में फंसकर ब्रेक लगाने को मजबूर करेंगे। ऐसे में लोगों को महसूस हो रहा है कि सड़क, रेल दोहरीकरण, विद्युतीकरण, लोकोशेड आदि विकास के काम बंद हो सकते हैं। इन कार्यों की गति को बनाए रखना किसी भी विपक्षी नेता के बस की बात नहीं है। अफजाल अंसारी सांसद बनने पर अपने परिवार और गुर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे। विकास के काम, उनके लिए मायने नहीं रखते हैं। इस चुनाव में पूरे देश में विपक्ष मोदी सरकार को विकास के नाम पर घेर रहा है तो गाज़ीपुर में विपक्ष इससे भाग रहा है। विकास के इतने सारे काम चल रहे हैं कि इनके रुकने की आशंका मतदाताओं को परेशान कर रही है। राजनीतिक खूंटा कमजोर हुआ तो कोई दूसरा नेता इनको अपने क्षेत्र में खींच ले जा सकता है। लोगों को लग रहा है कि मनोज सिन्हा अगर हार गये तो विकास के गाज़ीपुर तरस जाएगा। गंगा पर बन रहे रेल सह सड़क पुल का काम छह महीने में पूरा होना है, वो 6 साल में भी पूरा नहीं हो पाएगा। गाज़ीपुर से चलने वाली ट्रेनों का स्थान बदल जाएगा। स्टेशन की देखरेख बंद हो जाएगी। इससे रोजगार भी प्रभावित होगा।
 यूं तो गाज़ीपुर से स्वामी सहजानंद सरस्वती, डॉ एम ए अंसारी, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व मंत्री कलराज मिश्र जैसे नेता हुए हैं। लेकिन जनता का सहयोग, प्यार और समर्थन पाकर राष्ट्रीय फलक पर एक बड़े नेता के रूप में मनोज सिन्हा का उभार लोगों को रोमांचित कर रहा है। चुनाव में इसकी चर्चा हो रही है। मनोज सिन्हा का यह सर्वोच्च नहीं है। उत्तर प्रदेश में 2017 में पूर्ण बहुमत मिलने पर श्री सिन्हा का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए चला था। इससे गाज़ीपुर के लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। लोगों को लगा था कि गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश की कमान संभालेगा। पर सपा बसपा के शासन में यह संभव ही नहीं है। आजादी के बाद पहली बार गाज़ीपुर को अपराध से हटकर विकास की राजनीति के क्षेत्र में पहचान मनोज सिन्हा के कारण मिली है। जनपदवासी इसे खोना नहीं चाहते हैं।

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